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गुरुवार, 3 अप्रैल 2025

संशोधित वक्फ बिल पास होने के बाद का भारत: एक विश्लेषण


संशोधित वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 को लोकसभा में 2 अप्रैल 2025 को पेश किया गया और 12 घंटे की तीखी बहस के बाद 288 मतों के पक्ष में और 232 मतों के विरोध में पारित हो गया। इसके बाद यह विधेयक राज्यसभा में भी मंजूरी के लिए प्रस्तुत किया जाएगा। यह बिल वक्फ अधिनियम, 1995 में व्यापक बदलाव लाने का प्रयास करता है, जिसका उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता, जवाबदेही और समावेशिता लाना है। इस लेख में हम इस बिल के पारित होने के बाद भारत में संभावित सामाजिक, कानूनी और राजनीतिक प्रभावों का विश्लेषण करेंगे
 संशोधित वक्फ बिल के प्रमुख प्रावधान
संशोधित वक्फ बिल में कई महत्वपूर्ण बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं, जो इसके प्रभाव को समझने के लिए आवश्यक हैं:
1. गैर-मुस्लिम और महिला सदस्यों की नियुक्ति : वक्फ बोर्ड और केंद्रीय वक्फ परिषद में कम से कम दो गैर-मुस्लिम सदस्यों और दो महिलाओं की नियुक्ति अनिवार्य की गई है।
2. संपत्ति विवादों में जिला कलेक्टर की भूमिका: 
वक्फ संपत्तियों के स्वामित्व विवादों को अब वक्फ ट्रिब्यूनल के बजाय जिला कलेक्टर द्वारा जांचा जाएगा, जिसके बाद हाई कोर्ट में अपील की जा सकती है।
3. पंजीकरण की अनिवार्यता: वक्फ संपत्तियों को जिला मजिस्ट्रेट के कार्यालय में पंजीकृत करना अनिवार्य होगा, जिससे पारदर्शिता बढ़ेगी।
4. वक्फ गठन की शर्तें: 
केवल वही व्यक्ति वक्फ संपत्ति दान कर सकता है, जिसने कम से कम पांच साल तक इस्लाम का पालन किया हो, और दानकर्ता को संपत्ति का मालिक होना चाहिए।
5. सरकारी संपत्तियों पर दावे का अंत: 
सरकारी संपत्तियों को वक्फ संपत्ति के रूप में दावा करने की प्रथा समाप्त की गई है।
बदलाव से होंगे ये प्रभाव 
 सामाजिक प्रभाव
संशोधित वक्फ बिल के पारित होने से भारतीय समाज में कई स्तरों पर बदलाव देखने को मिल सकते हैं:


महिलाओं और गैर-मुस्लिमों का समावेश
 वक्फ बोर्ड में महिलाओं और गैर-मुस्लिमों की भागीदारी से प्रबंधन में विविधता आएगी, जो लैंगिक समानता और समावेशिता को बढ़ावा दे सकती है। हालांकि, कुछ धार्मिक नेताओं का मानना है कि यह वक्फ की मूल भावना को कमजोर करेगा।
आदिवासी और अन्य वंचित समूह
 यह बिल आदिवासियों या अन्य वंचित समूहों के भूमि अधिकारों को सीधे प्रभावित नहीं करता, लेकिन वक्फ संपत्तियों पर दावों के कम होने से इन समुदायों के लिए भूमि विवादों में राहत मिल सकती है।
कानूनी प्रभाव
पारदर्शिता और जवाबदेही
 वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण और जिला कलेक्टर की भूमिका से अवैध कब्जे और दुरुपयोग पर अंकुश लगेगा। पहले वक्फ बोर्ड की धारा 40 के तहत असीमित शक्तियां थीं, जो अब सीमित हो जाएंगी।
न्यायिक प्रक्रिया में बदलाव
हाई कोर्ट तक अपील का प्रावधान होने से वक्फ संपत्तियों से जुड़े विवादों में निष्पक्षता बढ़ेगी। हालांकि, इससे कानूनी प्रक्रिया लंबी और जटिल भी हो सकती है।
-समानता का सवाल
संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत समानता के सिद्धांत को मजबूत करने का दावा किया जा रहा है, क्योंकि यह बिल एक विशेष धार्मिक समुदाय को मिलने वाली विशेष सुविधाओं को संतुलित करता है। लेकिन विपक्ष इसे धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) पर हमला मानता है।



#### आर्थिक प्रभाव
वक्फ बोर्ड के पास 9.4 लाख एकड़ भूमि और 8.7 लाख संपत्तियां हैं, जिनकी कीमत लगभग 1.2 लाख करोड़ रुपये आंकी गई है। इस बिल से:
- **संपत्ति का बेहतर उपयोग**: पारदर्शी प्रबंधन से इन संपत्तियों का आर्थिक उपयोग बढ़ सकता है, जिससे राजस्व में वृद्धि होगी।
- **विवादों में कमी**: अवैध दावों और कब्जे पर रोक लगने से संपत्ति बाजार में स्थिरता आएगी।

#### चुनौतियां और भविष्य
- **प्रतिरोध और आंदोलन**: AIMPLB और अन्य संगठनों ने बिल के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन की धमकी दी है। यदि यह तनाव बढ़ता है, तो सामाजिक अशांति का खतरा हो सकता है।
कानूनी चुनौतियां: बिल के कुछ प्रावधानों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है, खासकर धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के मुद्दों पर।
राज्य सरकारों का रुख
पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे राज्यों ने इसे लागू न करने की बात कही है, जिससे संघीय ढांचे पर असर पड़ सकता है।
 निष्कर्ष
संशोधित वक्फ बिल के पारित होने के बाद भारत एक नए दौर में प्रवेश करेगा, जहां वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन अधिक पारदर्शी और समावेशी हो सकता है। हालांकि, यह सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण को भी बढ़ा सकता है। सरकार के लिए चुनौती होगी कि वह इस कानून को लागू करते समय सामुदायिक भावनाओं का सम्मान करे और संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखे। यह बिल भारत के धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक चरित्र की एक बड़ी परीक्षा साबित हो सकता है।
Disclaimer 
यह विश्लेषण वर्तमान जानकारी और संभावित परिदृश्यों पर आधारित है। वास्तविक प्रभाव समय के साथ ही स्पष्ट होंगे।


भूमि संबंधी कानूनों की मौजूदगी में वक्फ कानून का औचित्य: एक विश्लेषण


भारत में भूमि संबंधी कानूनों का एक व्यापक ढांचा मौजूद है, जिसमें भू राजस्व संहिता, भू अभिलेखन, संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम जैसे कानून शामिल हैं। ये कानून न केवल संवैधानिक रूप से वैध हैं, बल्कि देश की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था को सुचारु रूप से संचालित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस संदर्भ में, वक्फ कानून और वक्फ बोर्ड के गठन की प्रासंगिकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यह लेख इस बात का विश्लेषण करता है कि क्या वक्फ कानून वास्तव में औचित्यपूर्ण है या यह संवैधानिक व्यवस्था के प्रतिकूल है। साथ ही, यह भी जांच करता है कि क्या यह कानून समाज के कमजोर वर्गों, जैसे आदिवासियों, के हितों की रक्षा के लिए आवश्यक है या नहीं।

#### भारत में भूमि संबंधी कानूनों का ढांचा
भारत में भूमि संबंधी कानूनों का विकास औपनिवेशिक काल से लेकर स्वतंत्रता के बाद तक एक लंबी प्रक्रिया रही है। **भू राजस्व संहिता** विभिन्न राज्यों में लागू होती है और यह भूमि के स्वामित्व, कराधान और उपयोग को नियंत्रित करती है। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश भू राजस्व संहिता, 2006 भूमि के रिकॉर्ड, उत्परिवर्तन और विवाद निपटारे को व्यवस्थित करती है। **संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882** संपत्ति के स्वामित्व हस्तांतरण को वैधानिक रूप प्रदान करता है, जबकि **पंजीकरण अधिनियम, 1908** संपत्ति के दस्तावेजीकरण को सुनिश्चित करता है। ये कानून संविधान के अनुच्छेद 246 के तहत राज्य और केंद्र सरकार के विधायी अधिकार क्षेत्र में आते हैं, जो संपत्ति और भूमि को राज्य सूची का विषय बनाते हैं।

ये कानून संवैधानिक रूप से आवश्यक हैं क्योंकि ये अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 300A (संपत्ति का अधिकार) जैसे मौलिक सिद्धांतों को लागू करते हैं। इसके अलावा, **भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013** जैसे कानून यह सुनिश्चित करते हैं कि भूमि अधिग्रहण पारदर्शी और न्यायसंगत हो। इस व्यापक ढांचे के बावजूद, वक्फ कानून एक अलग व्यवस्था के रूप में मौजूद है, जो इसकी प्रासंगिकता पर सवाल उठाता है।

#### वक्फ कानून और वक्फ बोर्ड: एक अवलोकन
वक्फ इस्लामी कानून के तहत एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति को धार्मिक, परोपकारी या सामुदायिक उद्देश्यों के लिए समर्पित करता है। भारत में वक्फ को **वक्फ अधिनियम, 1995** (जिसमें 2013 में संशोधन किया गया) के तहत नियंत्रित किया जाता है। इस कानून के तहत वक्फ बोर्ड का गठन किया गया, जो वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन, संरक्षण और सर्वेक्षण का कार्य करता है। वक्फ बोर्ड को धारा 40 के तहत यह अधिकार है कि वह किसी संपत्ति को वक्फ संपत्ति घोषित कर सकता है, यदि उसे ऐसा प्रतीत होता है कि वह वक्फ के अंतर्गत आती है।

आंकड़ों के अनुसार, भारत में वक्फ बोर्ड के पास 8.7 लाख से अधिक संपत्तियां हैं, जो लगभग 9.4 लाख एकड़ भूमि पर फैली हैं। यह रेलवे और रक्षा मंत्रालय के बाद देश में तीसरा सबसे बड़ा भूमि धारक माना जाता है। हालांकि, इसकी शक्तियों और कार्यप्रणाली पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं।

#### वक्फ कानून का औचित्य: एक आलोचनात्मक दृष्टिकोण
1. **संवैधानिक व्यवस्था के प्रतिकूलता का प्रश्न**  
   भारत का संविधान धर्मनिरपेक्षता और समानता के सिद्धांतों पर आधारित है। अनुच्छेद 14 के तहत सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता का अधिकार है, जबकि अनुच्छेद 15 धर्म के आधार पर भेदभाव को निषिद्ध करता है। वक्फ कानून, जो केवल एक विशेष धार्मिक समुदाय के लिए बनाया गया है, इन सिद्धांतों के उल्लंघन का आरोप झेलता है। उदाहरण के लिए, हिंदू, सिख या अन्य धार्मिक समुदायों के लिए समानांतर व्यवस्था मौजूद नहीं है। यह तर्क दिया जा सकता है कि वक्फ कानून एक विशेष समुदाय को अनुचित लाभ प्रदान करता है, जो संवैधानिक समानता के खिलाफ है।

   इसके अलावा, वक्फ संपत्तियों को **लिमिटेशन एक्ट, 1963** की धारा 107 से छूट प्राप्त है, जिसका अर्थ है कि इन संपत्तियों को पुनर्प्राप्त करने के लिए कोई समय सीमा नहीं है। यह सुविधा अन्य धार्मिक ट्रस्टों को उपलब्ध नहीं है, जो इसे असमान बनाता है।

2. **मौजूदा कानूनों की पर्याप्तता**  
   संपत्ति के प्रबंधन और हस्तांतरण के लिए पहले से ही व्यापक कानून मौजूद हैं। यदि कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति को परोपकारी उद्देश्यों के लिए दान करना चाहता है, तो वह **ट्रस्ट अधिनियम, 1882** या **सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860** के तहत ऐसा कर सकता है। इन कानूनों के तहत बनाए गए ट्रस्ट सभी समुदायों के लिए उपलब्ध हैं और किसी विशेष धर्म से संबद्ध नहीं हैं। ऐसे में, वक्फ कानून की आवश्यकता पर सवाल उठता है।

3. **वक्फ बोर्ड की शक्तियों का दुरुपयोग**  
   वक्फ बोर्ड पर अक्सर यह आरोप लगता है कि वह अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करता है। धारा 40 के तहत बोर्ड किसी भी संपत्ति को वक्फ घोषित कर सकता है, जिसके बाद मालिक को यह साबित करना पड़ता है कि वह उसका नहीं है। यह प्रक्रिया पारदर्शिता और निष्पक्षता की कमी को दर्शाती है। कई मामलों में, सरकारी और निजी संपत्तियों पर भी वक्फ बोर्ड ने दावा किया है, जिससे विवाद उत्पन्न हुए हैं। **वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024** में इन शक्तियों को सीमित करने और पारदर्शिता बढ़ाने का प्रयास किया गया है, लेकिन यह अभी भी विवादास्पद बना हुआ है।

#### आदिवासियों के भूमि अधिकार और वक्फ कानून
आदिवासी समुदायों के भूमि अधिकारों की रक्षा करना सरकार की नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी है। **वन अधिकार अधिनियम, 2006** और **पेसा अधिनियम, 1996** जैसे कानून इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। ये कानून आदिवासियों को उनकी पारंपरिक भूमि पर अधिकार प्रदान करते हैं और उनकी संस्कृति को संरक्षित करते हैं। इसके विपरीत, वक्फ कानून का उद्देश्य धार्मिक और परोपकारी संपत्तियों का प्रबंधन करना है, न कि सामाजिक रूप से वंचित समूहों के अधिकारों की रक्षा करना। इसलिए, आदिवासियों के संदर्भ में वक्फ कानून को आवश्यक मानना तर्कसंगत नहीं है।

#### निष्कर्ष
भारत में मौजूदा भूमि संबंधी कानूनों की व्यापकता और संवैधानिक ढांचे को देखते हुए, वक्फ कानून और वक्फ बोर्ड का गठन प्रथम दृष्टया औचित्यहीन प्रतीत होता है। यह न केवल संवैधानिक समानता और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के खिलाफ है, बल्कि मौजूदा कानूनों के साथ अनावश्यक दोहराव भी पैदा करता है। समाज के कमजोर वर्गों, जैसे आदिवासियों, के हितों की रक्षा के लिए पहले से ही प्रभावी कानून मौजूद हैं, जिसके चलते वक्फ कानून की आवश्यकता संदिग्ध है। इस संदर्भ में, एक समान नागरिक संहिता और एकीकृत संपत्ति कानून की दिशा में बढ़ना अधिक तर्कसंगत और संवैधानिक रूप से उचित होगा।

#### संदर्भ
1. **वक्फ अधिनियम, 1995** - भारत सरकार, विधि और न्याय मंत्रालय।
2. **संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882** - भारत सरकार, विधि और न्याय मंत्रालय।
3. **पंजीकरण अधिनियम, 1908** - भारत सरकार, विधि और न्याय मंत्रालय।
4. **उत्तर प्रदेश भू राजस्व संहिता, 2006** - उत्तर प्रदेश सरकार।
5. **भारत का संविधान** - अनुच्छेद 14, 15, 246, 300A।
6. **वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024** - लोकसभा में पेश दस्तावेज।
7. **वन अधिकार अधिनियम, 2006** - भारत सरकार, जनजातीय कार्य मंत्रालय।

यह लेख तथ्यों और कानूनी ढांचे के आधार पर वक्फ कानून की प्रासंगिकता पर एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।

शुक्रवार, 21 मार्च 2025

किशोर उम्र की मुश्किलें !

किशोर अवस्था जीवन का एक संवेदनशील और परिवर्तनशील चरण है, जिसमें शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक बदलाव तेजी से होते हैं। यह वह समय है जब व्यक्ति बचपन से वयस्कता की ओर बढ़ता है और अपनी पहचान, स्वतंत्रता और सामाजिक भूमिकाओं को समझने की कोशिश करता है। हार्मोनल बदलाव, सामाजिक दबाव और व्यक्तिगत इच्छाएं इस चरण को जटिल बनाती हैं। इस दौरान शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का प्रबंधन न केवल व्यक्तिगत विकास के लिए आवश्यक है, बल्कि यह समाज के भविष्य को भी प्रभावित करता है। इस लेख में हम किशोरों में शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के कारण, उनके दुष्परिणाम, भारत और यूरोपीय देशों के तुलनात्मक आंकड़े, और निदान पर चर्चा करेंगे, जिसमें ड्रग्स, सेक्स की लत, विद्रोही व्यवहार, असंयमित क्रोध और अपराध की प्रवृत्ति जैसे मुद्दों के साथ-साथ भारतीय योग, खेलकूद और बौद्धिक अभ्यासों को स्वास्थ्य प्रबंधन के अभिन्न अंग के रूप में शामिल किया जाएगा।

#### शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण 
किशोरावस्था में हार्मोनल बदलाव, जैसे टेस्टोस्टेरोन और एस्ट्रोजन का बढ़ना, यौनिक उत्तेजना को जन्म देता है, जिसे समझने और नियंत्रित करने में किशोर अक्सर असमर्थ होते हैं। यह उत्तेजना कई बार सेक्स की लत या असुरक्षित यौन व्यवहार का कारण बनती है। ड्रग्स और मादक पदार्थों का सेवन जिज्ञासा, पीयर प्रेशर या तनाव से बचने की चाह से शुरू होता है। भारत में संयुक्त परिवारों का दबाव, पढ़ाई की प्रतिस्पर्धा और यूरोप में व्यक्तिवादिता व सोशल मीडिया का प्रभाव इन समस्याओं को बढ़ाता है। 

घर के प्रति विद्रोही व्यवहार और असंयमित क्रोध हार्मोनल असंतुलन, पारिवारिक तनाव और संवाद की कमी से उत्पन्न होते हैं। अनियमित दिनचर्या, जंक फूड, नींद की कमी और शारीरिक गतिविधियों में कमी शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। मानसिक स्वास्थ्य पर पढ़ाई, दोस्तों और सोशल मीडिया का दबाव तनाव, चिंता और अवसाद को बढ़ाता है। इन सबके बीच, किशोरों का आवेगपूर्ण व्यवहार और निर्णय लेने में असमर्थता उन्हें अपराध की ओर भी ले जा सकती है।

#### भारत और यूरोपीय देशों के किशोरों का तुलनात्मक अध्ययन (आंकड़ों सहित) 
- **ड्रग्स की लत**: भारत में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय (2019) के अनुसार, मादक पदार्थों का सेवन करने वालों में 13% की उम्र 20 साल से कम है। NCRB 2022 के अनुसार, नशे से जुड़े अपराधों में किशोरों की संलिप्तता बढ़ी है। यूरोप में, EMCDDA 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, 15-19 आयु वर्ग के 17% किशोरों ने नशीले पदार्थों का सेवन किया। 
- **सेक्स की लत और यौन व्यवहार**: भारत में UNFPA 2020 के अनुसार, 15-19 आयु की 6% किशोर लड़कियां गर्भवती होती हैं। यूरोप में, यूरोस्टेट 2022 के अनुसार, 15-19 आयु वर्ग में 10% किशोरों ने यौन संचारित रोगों का सामना किया। 
- **विद्रोही व्यवहार और क्रोध**:
भारत में NCRB 2022 के अनुसार, किशोर अपराधों में 40% मामले पारिवारिक विवाद से शुरू होते हैं। यूरोप में, FRA 2021 के अनुसार, 12% किशोरों ने माता-पिता के खिलाफ हिंसक व्यवहार दिखाया। 
- **अपराध**: भारत में NCRB 2022 के अनुसार, किशोर अपराधों में 5% की वृद्धि हुई। यूरोप में, यूरोस्टेट 2022 के अनुसार, किशोर अपराध दर 8% है। 

#### दुष्परिणाम 
शारीरिक स्वास्थ्य की उपेक्षा से मोटापा, मधुमेह और कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली विकसित होती है। ड्रग्स की लत से शारीरिक और मानसिक क्षति होती है, जबकि सेक्स की लत असुरक्षित यौन संबंधों से गंभीर परिणाम लाती है। विद्रोही व्यवहार और असंयमित क्रोध किशोरों को परिवार और समाज से दूर करता है, जिससे अपराध और आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती है। भारत में NCRB 2022 के अनुसार, किशोरों में आत्महत्या के मामले बढ़े हैं, और पलायन भी ग्रामीण क्षेत्रों में एक समस्या है। यूरोप में आत्महत्या और अपराध व्यक्तिगत अलगाव से अधिक जुड़े हैं।

#### निदान 
शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के प्रबंधन के लिए भारतीय योग अभ्यास, खेलकूद और बौद्धिक अभ्यास प्रभावी समाधान हैं। 
- **शारीरिक स्वास्थ्य**: संतुलित आहार (प्रोटीन, विटामिन, खनिज) और रोजाना 30-40 मिनट की शारीरिक गतिविधि जरूरी है। **खेलकूद** जैसे क्रिकेट, फुटबॉल या बैडमिंटन न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को बढ़ाते हैं, बल्कि हार्मोनल संतुलन और तनाव को भी कम करते हैं। **भारतीय योग अभ्यास** जैसे सूर्य नमस्कार, प्राणायाम और भस्त्रिका शारीरिक लचीलापन, ऊर्जा और मानसिक शांति प्रदान करते हैं। नींद के 7-8 घंटे सुनिश्चित करना भी जरूरी है। 
- **मानसिक स्वास्थ्य**: **योग और ध्यान** (जैसे अनुलोम-विलोम और माइंडफुलनेस) तनाव, क्रोध और आवेग को नियंत्रित करते हैं। **बौद्धिक अभ्यास** जैसे **चित्रकारी** भावनाओं को व्यक्त करने का रचनात्मक माध्यम है, **भाषण कला** आत्मविश्वास बढ़ाती है, **कविता लेखन** मन को शांत और केंद्रित करती है, और **संगीत साधना** (गायन या वादन) मानसिक तनाव को कम करती है। ये गतिविधियां ड्रग्स और सेक्स की लत से ध्यान हटाकर सकारात्मक दिशा प्रदान करती हैं। 
- **विशिष्ट समस्याओं के लिए**: ड्रग्स की लत से बचाव के लिए जागरूकता अभियान और पुनर्वास केंद्रों की पहुंच बढ़ानी चाहिए। सेक्स की लत और यौनिक उत्तेजना को नियंत्रित करने के लिए उम्र के अनुकूल यौन शिक्षा और माता-पिता से खुली बातचीत जरूरी है। विद्रोही व्यवहार और क्रोध को नियंत्रित करने के लिए परिवार में संवाद, स्कूलों में काउंसलिंग और मेंटरशिप प्रोग्राम शुरू करने चाहिए। अपराध और आत्महत्या से बचाव के लिए हेल्पलाइन (जैसे चाइल्डलाइन 1098) और सामुदायिक सहायता को मजबूत करना होगा। गंभीर मामलों में मनोवैज्ञानिक की सलाह लेना उचित है। 
#निष्कर्ष 
किशोर अवस्था में शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का प्रबंधन एक जटिल लेकिन आवश्यक कार्य है। ड्रग्स, सेक्स की लत, विद्रोही व्यवहार, क्रोध और अपराध जैसी समस्याएं किशोरों को गलत रास्ते पर ले जा सकती हैं। भारत और यूरोप में इन समस्याओं के कारण और प्रभाव भिन्न हैं, लेकिन दोनों जगह भारतीय योग, खेलकूद और बौद्धिक अभ्यास जैसे चित्रकारी, भाषण कला, कविता लेखन और संगीत साधना स्वास्थ्य प्रबंधन के अभिन्न अंग बन सकते हैं। ये न केवल शारीरिक और मानसिक संतुलन बनाए रखते हैं, बल्कि किशोरों को सकारात्मक दिशा में प्रेरित करते हैं। परिवार, समाज और सरकार के संयुक्त प्रयास से यह पीढ़ी स्वस्थ, सशक्त और जिम्मेदार बन सकती है।
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बुधवार, 19 मार्च 2025

सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर की कहानी,

#youtube 🔗 
https://youtu.be/5JdrRGb8csQ
 नमस्ते और स्वागत है  मन की बात ब्लॉग पर जहाँ आज हम अंतरिक्ष अन्वेषण और तकनीक की नवीनतम कहानियों को आपके सामने लाते हैं। 
मैं हूँ गिरीश बिल्लौरे मुकुल , और आज हम बात करने जा रहे हैं दो नासा अंतरिक्ष यात्रियों, सुनीता विलियम्स और विल्मोर की अविश्वसनीय यात्रा के बारे में। ये दोनों अनुभवी अंतरिक्ष यात्री हाल ही में अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) पर एक लंबी अवधि की यात्रा से लौटे हैं, उनकी यात्रा मूल रूप से सिर्फ एक सप्ताह के लिए थी,
 लेकिन तकनीकी वज़ह से यह यात्रा नौ महीने तक खिंच गई। 
 तो, चलिए शुरू करते हैं
सुनीता और बुच विल्मोर का परिचय
 सबसे पहले, आइए इन दोनों अंतरिक्ष यात्रियों के बारे में थोड़ा जान लें। सुनीता विलियम्स एक ऐसी शख्सियत हैं जिनका नाम आपने सपना सुना ही है ।
वे भारतीय मूल की अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री हैं, जिनका जन्म 1965 में ओहियो में हुआ था।
  सुनीता ने अमेरिकी सेना में टेस्ट पायलट के रूप में काम किया और 30 से अधिक विभिन्न विमानों में 3,000 से ज्यादा उड़ान घंटे पूरे किए। 
वे आईएसएस पर लंबी अवधि तक रह चुकी हैं और पहले 322 दिन अंतरिक्ष में बिता चुकी हैं। एक समय वह सबसे लंबी अंतरिक्ष उड़ान करने वाली महिला थीं।
  बुच विल्मोर , का पूरा नाम बैरी बुच विल्मोर है। 1962 में टेनेसी में जन्मे ब विल्मोर सेना के रिटायर्ड कैप्टन हैं और एक अनुभवी टेस्ट पायलट भी।
  वह स्पेस शटल और रूसी सोयुज अंतरिक्ष यान दोनों से उड़ान भर चुके हैं। इस मिशन से पहले वह 178 दिन अंतरिक्ष में बिता चुके थे। सुनीता और विल्मोर दोनों ही अपने अनुभव और कौशल के दम पर अंतरिक्ष यात्रा के क्षेत्र में बड़े नाम हैं।
  5 जून, 2024 को सुनीता और विल्मोर ने फ्लोरिडा के केप कैनवरल से बोइंग के स्टारलाइनर अंतरिक्ष यान में सवार होकर उड़ान भरी। यह स्टारलाइनर का पहला मानव मिशन था, जो नासा के कमर्शियल क्रू प्रोग्राम का हिस्सा था।
 योजना तो यह थी कि यह एक आठ दिन का टेस्ट मिशन होगा—आईएसएस तक जाना, वहाँ कुछ दिन बिताना, और फिर धरती पर वापस आना।
 लेकिन दुर्भाग्य बस सब कुछ योजना के मुताबिक नहीं हुआ। 
लॉन्च से पहले ही स्टारलाइनर में एक हीलियम लीक की समस्या सामने आई थी, लेकिन नासा और बोइंग ने इसे स्थिर मानकर मिशन को आगे बढ़ाया। 
स्टार लाइनर आईएसएस के पास पहुँचा जरूर लेकिन इसमें चार बार हीलियम लिख के मामले सामने आए और पाँच थ्रस्टर फेल होने की शिकायत पाई गई। 
  ये थ्रस्टर अंतरिक्ष यान को नियंत्रित करने के लिए बहुत जरूरी होते हैं, खासकर डॉकिंग और वापसी के दौरान।
 फिर भी, सुनीता और विल्मोर ने 6 जून, 2024 को आईएसएस के साथ सफलतापूर्वक डॉकिंग की। 
 लेकिन स्टारलाइनर की समस्याओं के चलते उनकी वापसी जानलेवा साबित हो सकती थी। उनकी वापसी के लिए स्टार लाइनर को दुरुस्त करने की सारी कोशिशों की नाकामयाबी के बावजूद दोनों ने आईएसएस के क्रू के साथ मिलकर कई वैज्ञानिक प्रयोग किए, जैसे कि माइक्रोग्रैविटी का मानव शरीर पर प्रभाव और भविष्य के मिशनों के लिए नई तकनीकों का परीक्षण।
  सुनीता ने अपनी स्पेसवॉक की कला को भी जारी रखा। इस मिशन के दौरान उन्होंने अपनी नौवीं स्पेसवॉक पूरी की और महिला अंतरिक्ष यात्री के रूप में सबसे ज्यादा समय 62 घंटे और 6 मिनट स्पेसवॉक करने का रिकॉर्ड बनाया।
 विल्मोर ने भी स्टेशन के रखरखाव में मदद की और कुछ समय के लिए कमांडर की भूमिका भी निभाई।
 दोनों ने मिलकर यह सुनिश्चित किया कि आईएसएस सुचारू रूप से चलता रहे।
  स्टारलाइनर की तकनीकी समस्याओं की की चर्चा करें तो हम पाते हैं कि हीलियम लीक और थ्रस्टर फेल होने की वजह से यान की वापसी जोखिम का सौदा हो गया था । 
  नासा और बोइंग ने इन समस्याओं को समझने और ठीक करने की बहुत कोशिश की।
  सितंबर 2024 में स्टारलाइनर को बिना क्रू के धरती पर वापस लाया गया ताकि और डेटा इकट्ठा किया जा सके।लेकिन सुनीता और विल्मोर को अगस्त 2024 में यह फैसला सुनाया गया कि वे स्टारलाइनर से नहीं, बल्कि स्पेसएक्स के क्रू ड्रैगन यान से वापस आएँगे। 
 इसके लिए उन्हें फरवरी 2025 तक इंतजार करना था, जो बाद में मार्च 2025 तक बढ़ गया।
 इस बीच, इस स्थिति ने कुछ राजनीतिक ध्यान भी खींचा स्पेसएक्स के सीईओ एलन मस्क ने उस राष्ट्रपति चुनाव के दौरान एक राजनैतिक टिप्पणी की थी । जिसमें कहा गया था कि अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में "छोड़ दिया गया" था।
  लेकिन सुनीता और विल्मोर ने एक साक्षात्कार में इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि वे "फँसे" नहीं थे और टेस्ट मिशन में ऐसी देरी संभव थी।
  उन्होंने नासा पर भरोसा जताया और अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।
 इस दौरान आम जनता में उनकी सेहत को लेकर बेहद चिंता व्यक्त की जा रही थी। सुनीता के पतले दिखने की खबरों से लोग चिंतित हुए। 
 लेकिन नासा ने स्पष्ट किया कि उनके पास पर्याप्त भोजन था और उनकी सेहत की निगरानी की जा रही थी। आईएसएस पर फ्रीज-ड्राय और थर्मोस्टैबिलाइज़्ड भोजन के साथ-साथ ताजे फल और सब्जियाँ भी उपलब्ध होती हैं। डॉक्टर नियमित रूप से उनकी जाँच करते थे ताकि उनकी शारीरिक और मानसिक सेहत बनी रहे।
आखिरकार, 18 मार्च, 2025 को सुनीता और बुच विल्मोर स्पेसएक्स क्रू ड्रैगन में सवार होकर धरती पर लौटे। 17 घंटे की यात्रा के बाद उनका यान फ्लोरिडा के तट पर मैक्सिको की खाड़ी में उतरा।
  उनकी वापसी की तस्वीरों में वे मुस्कुराते और हाथ हिलाते नजर आए, जो उनकी राहत को दर्शाता था।
  पहली बात, यह नासा के लिए बोइंग और स्पेसएक्स के यह से लौटने वाले दोनों अंतरिक्ष यात्रियों की सहनशक्ति और अनुकूलन शीलता को उजागर करता है।
 तो दोस्तों, सुनीता विलियम्स और विल्मोर की यह यात्रा हमें मानव दृढ़ता और अंतरिक्ष अन्वेषण की जटिलताओं की याद दिलाती है। आठ दिन के मिशन से नौ महीने की यात्रा तक, उनकी कहानी प्रेरणादायक है।
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भारत में विवाह विच्छेद कारण और निदान

   अनुसंधान से पता चलता है कि भारत में विवाह-विच्छेद की दर बढ़ रही है, हालांकि यह वैश्विक स्तर पर अभी भी कम है, लगभग 1% 2022 में।यह संभावना है कि कारणों में सामाजिक मानदंडों में बदलाव, महिलाओं का सशक्तिकरण, शहरीकरण और असंगति शामिल हैं।सबूत संचार में सुधार, विवाह पूर्व परामर्श और विवाह विच्छेद रोकने के लिए पेशेवर चिकित्सा की ओर झुकते हैं।परिचयभारत में विवाह को हमेशा से एक पवित्र और अटूट बंधन के रूप में देखा गया है, जो न केवल दो व्यक्तियों को बल्कि उनके परिवारों को भी जोड़ता है। हाल के वर्षों में, विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में, विवाह-विच्छेद की दर में वृद्धि देखी गई है। इस पॉडकास्ट में, हम इस बढ़ती हुई प्रवृत्ति के कारणों पर चर्चा करेंगे और इसे रोकने के लिए व्यावहारिक समाधान प्रदान करेंगे। हम कुछ काल्पनिक कहानियों को भी शामिल करेंगे ताकि चर्चा अधिक संबंधित और रोचक बने।
आंकड़े और प्रवृत्तियांहालिया डेटा के अनुसार, भारत में विवाह-विच्छेद की दर 2022 में लगभग 1% (1,000 लोगों पर 0.01) है, जो 2020 के 0.022 और 2021 के 0.077 से बढ़ी है (divorce.com)। यह दर वैश्विक स्तर पर कम है, लेकिन शहरी क्षेत्रों में आधुनिक जीवनशैली के प्रभाव से यह बढ़ रही है।कारण और समाधानविवाह-विच्छेद की बढ़ती दर के पीछे कई कारक हैं, जैसे:
सामाजिक मानदंडों में बदलाव, जिससे विवाह-विच्छेद का टैबू कम हो रहा है।महिलाओं का सशक्तिकरण, जिससे वे आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो रही हैं और असंतोषजनक विवाहों को समाप्त करने के लिए तैयार हैं।
शहरीकरण, जो लंबे कार्यकाल और तनाव से परिवार के समय को कम कर रहा है।
असंगति, जहां अपेक्षाएं पूरी नहीं हो पातीं।समाधान में शामिल हैं:बेहतर संचार, जो मुद्दों को जल्दी संबोधित करता है।विवाह पूर्व परामर्श, जो वास्तविक अपेक्षाएं स्थापित करता है।पेशेवर चिकित्सा, जो जोड़ों को चुनौतियों से निपटने के लिए उपकरण प्रदान करती है।
 मिश्रित विश्लेषण से हम  तह चलते हैं
    भारत में विवाह सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक परंपराओं में गहराई से निहित है, अक्सर इसे दो व्यक्तियों और उनके परिवारों को जोड़ने वाले पवित्र बंधन के रूप में देखा जाता है। ऐतिहासिक रूप से, विवाह-विच्छेद की दर कम रही है, जिसमें सामाजिक दबाव और व्यवस्थित विवाह स्थिरता में योगदान देते हैं। हाल के वर्षों में, हालांकि, 2022 में विवाह-विच्छेद की दर 0.01 प्रति 1,000 लोगों की थी, जो 2020 के 0.022 और 2021 के 0.077 से बढ़ी है (divorce.com)। यह वृद्धि, विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में, ध्यान देने योग्य है।बढ़ती विवाह-विच्छेद दर के कारणशोध से कई कारकों का पता चलता है जो इस प्रवृत्ति को चला रहे हैं, जैसा कि हाल ही में द टाइम्स ऑफ इंडिया के एक लेख में विस्तार से बताया गया है (The Times of India)। इनमें शामिल हैं:
कारण विवरण 
बदलते सामाजिक मानदंड
विवाह-विच्छेद का टैबू कम हो रहा है, और लोग असंतोषजनक विवाहों को समाप्त करने के लिए अधिक तैयार हो रहे हैं।महिलाओं का सशक्तिकरण शिक्षा और रोजगार के अवसरों में वृद्धि से महिलाएं आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो रही हैं, जिससे वे असंतोषजनक या दुर्व्यवहारपूर्ण विवाहों में रहने से इनकार कर रही हैं।
शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली शहरों में लंबे कार्यकाल और तनावपूर्ण जीवनशैली परिवार के समय को कम कर रहे हैं, जिससे रिश्तों पर दबाव पड़ रहा है।असंगतिविवाह से अत्यधिक अपेक्षाएं, जैसे भावनात्मक पूर्ति, अक्सर पूरी नहीं हो पाती, जिससे असंतोष बढ़ता है।
कानूनी जागरूकता 
आपसी सहमति से तलाक लेने की प्रक्रिया को आसान बनाया गया है, और लोगों में कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ी है।
संयुक्त परिवार प्रणाली का पतन
एकल परिवारों में संक्रमण के कारण विस्तारित परिवार का समर्थन कम हो गया है, जिससे जोड़ों पर अधिक दबाव पड़ता है।

सांख्यिकीय आंकड़ों का विश्लेषण 

राज्यों के आधार पर सटीक डेटा सीमित था, लेकिन 2023 की एक रिपोर्ट ने भिन्नताओं को उजागर किया, जिसमें महाराष्ट्र में सबसे अधिक विवाह-विच्छेद दर 18.7% और केरल में सबसे कम 6.3% थी (Times of India)। 
आयु के आधार पर, 
20-35 वर्ष के लोग विवाह-विच्छेद से संबंधित जानकारी खोजने की सबसे अधिक संभावना रखते हैं, और पुरुषों में इसकी खोज अधिक है, 2022 के एक विश्लेषण के अनुसार (ADJUVA LEGAL)।
समाधान और रोकथाम के उपाय
इन चुनौतियों का सामना करने के लिए, कई रणनीतियां विवाह-विच्छेद को रोकने में मदद कर सकती हैं, जैसा कि उसी टाइम्स ऑफ इंडिया लेख में वर्णित है (The Times of India)।
 इनमें शामिल हैं:
समाधान विवरण प्रभावी संचार 
खुले, ईमानदार और सम्मानजनक संवाद से भावनाओं और अपेक्षाओं पर नियमित रूप से चर्चा की जा सकती है।
विवाह पूर्व परामर्श से वास्तविक अपेक्षाएं स्थापित करना, इस तरह की परामर्श सेवा में वित्त, बच्चे, करियर के लक्ष्यों पर विवाह से पहले चर्चा करना आवश्यक होगा.
निरंतर सीखना और अनुकूलन
 एक साथ की इच्छा, बदलती जरूरतों के अनुसार अनुकूलन, और समझौता करना।गुणवत्तापूर्ण समयसाझा गतिविधियां, शौक, और नियमित डेट नाइट्स से भावनात्मक संबंध मजबूत करना।अपेक्षाओं का प्रबंधनसमझना कि कोई संबंध पूर्ण नहीं होता, स्वीकृति और समझौते पर ध्यान केंद्रित करना।पारस्परिक सम्मान और समर्थनव्यक्तिगत विकास का सम्मान करना, व्यक्तिगत वृद्धि का समर्थन करना, और साझेदारी को बढ़ावा देना।संघर्ष निवारण कौशलदोषारोपण से बचना, सक्रिय सुनना, और मुद्दों को तत्काल संबोधित करना।साझा जिम्मेदारियांघरेलू और वित्तीय कर्तव्यों का समान विभाजन तनाव और रोष को कम करता है।भावनात्मक बुद्धिमत्ता और सहानुभूतिभावनाओं को समझना और प्रबंधित करना, साथी के प्रति सहानुभूति रखना।पेशेवर परामर्श और चिकित्साजल्दी मदद लेना, चिकित्सा को गहरी समस्याओं को संबोधित करने के लिए एक सुरक्षित स्थान के रूप में उपयोग करना।ये उपाय विशेष रूप से आधुनिक दबावों के सामने विवाहों में लचीलापन बनाने के लिए हैं।
चर्चा को संबंधित बनाने के लिए, पॉडकास्ट में इन बिंदुओं को दर्शाने वाली काल्पनिक कहानियां शामिल हैं। उदाहरण के लिए:रिया और आयन की कहानी: मुंबई जाने वाले एक जोड़े को शहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जैसे लंबे कार्यकाल। परामर्श के माध्यम से, वे बेहतर संवाद सीखते हैं और अपना विवाह बचाते हैं, जिससे पेशेवर मदद का महत्व उभरकर सामने आता है।मीरा और विक्रम की कहानी: सोशल मीडिया से प्रभावित होकर, उनकी अपेक्षाएं अवास्तविक हो जाती हैं, जिससे झगड़े होते हैं। विवाह पूर्व परामर्श (उनके मामले में विवाह के बाद) उन्हें वास्तविक लक्ष्य निर्धारित करने में मदद करता है, जिससे अपेक्षाओं के प्रबंधन का महत्व स्पष्ट होता है।सोनिया और राहुल की कहानी: संयुक्त परिवार से परमाणु परिवार में संक्रमण उन्हें जिम्मेदारियों से जूझने पर मजबूर करता है। कार्यों को समान रूप से बांटने और परिवार की बैठकें करने से वे अनुकूलित होते हैं, जिससे साझा जिम्मेदारियों की आवश्यकता उभरकर सामने आती है।ये कहानियां, हालांकि काल्पनिक हैं, कई जोड़ों द्वारा सामना की गई वास्तविक चुनौतियों पर आधारित हैं, जिससे पॉडकास्ट आकर्षक और व्यावहारिक बनता है।निष्कर्ष और प्रभावभारत में विवाह-विच्छेद की बढ़ती दर, भले ही अभी भी कम हो, व्यापक सामाजिक बदलावों का प्रतिबिंब है। जबकि शहरीकरण और महिलाओं का सशक्तिकरण लाभकारी हैं, वे वैवाहिक स्थिरता के लिए नई चुनौतियां लाते हैं। प्रस्तावित समाधान, संचार से चिकित्सा तक, जोड़ों के लिए कार्रवाई योग्य चरण प्रदान करते हैं। काल्पनिक कहानियां यह रेखांकित करती हैं कि प्रयास और समर्थन के साथ, कई विवाह बचाए जा सकते हैं, श्रोताओं को अपने जीवन में इन अंतर्दृष्टि को लागू करने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।यह विश्लेषण, हाल के शोध और सांख्यिकीय डेटा पर आधारित, एक व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करता है, जो सुनिश्चित करता है कि आलेख सूचनात्मक और तथ्यों पर केंद्रित है।
आशा है आपको अच्छा लगा होगा।
मुख्य संदर्भ:Why do most divorces in India happen and basic things that can prevent themDivorce Rates in the World Updated 2024States with highest and lowest divorce rates in IndiaDivorce Rate in India ADJUVA LEGAL December 2024
#भारत, #भारतीयसमाज, #विवाह #विवाहविच्छेद #कारणऔरनिदान

शनिवार, 11 जनवरी 2025

Live -|| Day-1 || नार्मदीय ब्राह्मण समागम 2025 || 11-01-2025 || इंदौर लाइव

गुरुवार, 17 अक्टूबर 2024

Mysteries of the soul | आत्मा होती ही नहीं ?


आमतौर पर अपने आप को इंटेलेक्चुअल साबित करने वाले लोग आत्मा के अस्तित्व को अस्वीकार करते हैं !   जो लोग परंपरागत विचारों को मानते हैं वह आत्मा के अस्तित्व से इंकार नहीं करते। आत्मा के इस होने न होने के प्रश्न उत्तर एवं तर्क वितर्क के  बीच बहुत कम लोग ही हैं जिन्होंने आत्मा के अस्तित्व को लेकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हैं। और तो और कुछ लोग तो  इस मुद्दे पर  बात करने से लोग बचते भी हैं।   कुछ वैज्ञानिकों का विचार  है कि आत्मा को किसी आत्मा अभौतिक तत्व है।  जो विश्वासों पर निर्भर करता है। यह एक डिप्लोमेटिक रिप्लाई है। इससे आत्मा परिभाषित करने में कठिनाई होती है। क्योंकि  यह प्रश्न हमारे अस्तित्व  और जीवन के अर्थ से जुड़ा है।  अत: इसका परीक्षण करना आवश्यक है। ताकि आत्मा शब्द की परिभाषा का न्यायसंगत  प्रबोधन हो सके। भारतीय दर्शन में आत्मा की अवधारणा सदियों से विद्यमान रही है, दूसरी ओर पश्चिम भी आत्मा के अस्तित्व को स्वीकृति देता है।   परंतु अधिकांश  वैज्ञानिक सोच रखने वाले  आत्मा शब्द के अस्तित्व पर सवाल उठाते हैं।       तर्कवादी तो अक्सर इस मुद्दे पर आत्मा की अस्तित्व को मानने वालों का ही मजाक बनाते हैं ।   आत्मा  भले ही भौतिक रूप से देखी न जा सके, परंतु ऊर्जा को उत्पादित करने वाला ऐसा तत्व अवश्य है, जो सदा शरीर या  ब्रह्मांड में बना रहता है। इसे और स्पष्ट रूप से समझिए 1. आत्मा या तो शरीर में रहती है 2. अथवा ब्रह्मांड में स्वतंत्र विचरण करती है।     आत्मा की मौजूदगी में शरीर में क्या होता है ? आत्मा की मौजूदगी में शरीर में भावात्मकता, जैसे कार्य करने की प्रेरणा, कार्य न करने का संदेश, दुःख, आंतरिक पीढ़ा, क्रोध, प्रेम, यानी समस्त मानवीय भावनाएं सक्रिय रहती हैं।    आपने कभी भी जड़ पदार्थ में ऐसी भावात्मक उत्तेजना महसूस नहीं की होगी।   आत्मा शरीर द्वारा किए गए कार्यों का डेटाबेस भी तैयार करती है। उसे संचित करती है । अच्छे और बुरे कार्य आत्मकोश में केंद्रित होते हैं।   आत्मा उपयोग में लाए गए भौतिक पदार्थों से  भौतिक रूप से अर्जित की जाने वाली ऊर्जा को प्राप्त करने, उसके आवश्यकता अनुसार शरीर में वितरण करने, के  अनुदेश अर्थात इंस्ट्रक्शंस शरीर की संरचना में उत्तरदाई अंगों को देती है।    आत्मा मस्तिष्क को संचालित करती है।    आत्मा के बारे में एक आस्तिक  लेखक के रूप में मेरा स्पष्ट मत है कि - "आत्मा , एक ऐसा अभौतिक सुप्त ऊर्जा मंजूषा है जिसमें भौतिक पदार्थों से ऊर्जा जनरेट करने की क्षमता भी होती है।   हम जानते हैं कि शरीर के संचालन के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है ? इस ऊर्जा के आवश्यकता अनुसार वितरण के लिए जिम्मेदार तत्व आत्मा ही तो है।  वर्ष 2024 में एक ऐसे योगी  नर्मदा परिक्रमा पर हैं, जिन्होंने कई वर्षों से भोजन नहीं किया, कुछ मिलीलीटर पानी पीकर तथा धूप एवं हवा से शरीर के लिए ऊर्जा प्राप्त कर यात्रा कर रहे हैं। जबलपुर मेडिकल कॉलेज में जिनकी मेडिकल जांच की कराई गई। मेडिकल जांच में उनके सारे वाईटल मैट्रिक्स सामान्य या सामान्य से बेहतर पाए गए। उन के शरीर को यह ऊर्जा कैसे प्राप्त हो रही होगी ?    शरीर के लिए प्रोटीन कैलोरी माइक्रोन्यूट्रिएंट्स, टेंपरेचर, धूप छांह, सब की जरूरत होती है। इसे प्राप्त कर  शरीर में  आवश्यकता अनुसार संप्रेषित कौन करता है ?   कौन सा तत्व है जो अभौतिक घटकों  जैसे विचारों, भावों, गुणों, आदि को रेग्यूलेट करता है ?    बेशक वह तत्व आत्मा ही है। आत्मा के अस्तित्व की पुष्टि पुनर्जन्म की अवधारणा से भी होती है।   भारतीय ग्रंथों, जैसे श्रीमद् भगवत गीता, में आत्मा के होने के साथ साथ उसकी अमर होने का प्रमाण दिया है।   भगवान श्री कृष्ण के कथन के अनुसार, आत्मा न जलाई जाती है, न काटी जा सकती है, न उसे कभी भी समाप्त किया जा सकता है। बौद्ध साहित्य में ललित विस्तार, त्रिपिटक, अश्वघोष द्वारा रचित बुद्धचरित्र एवं अन्य बहुत सी प्रमाणित पुस्तकों में लिखा है की मायादेवी ने स्वप्न में एक श्वेत हाथी को उनके गर्भ में घुसते हुए देखा था।  महामाया जिस दृश्य को स्वप्न में देख रहीं थी।  बुद्ध का अवतरण तुषितलोक से हाथी के रुप में हुआ था।  धार्मिक एवं सांस्कृतिक संदर्भ में, महात्मा बुद्ध के जन्म की यह कथा यदि सत्य है तो आत्मा की अस्तित्व को स्वीकार करना चाहिए ।   बुद्ध के जन्म से संबंधित कहानियों को काल्पनिक मानने का साहस कैसे किया जा सकता है ? यदि हम इन घटनाओं को अस्वीकार करते हैं, तो स्वयं हमारी ही सोच के मानदंड भी ध्वस्त हो जाते हैं। विज्ञान के इस युग में मनो चिकित्सक इयान स्टीवंसन के अनुसंधान में 2000 से अधिक पुनर्जन्म  प्रकरणों का अध्ययन किया , जिन्हें सही भी पाया। जबकि भारत में नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंस के डॉक्टर सतवंत पसारिया की पुनर्जन्म पर 500 घटनाओं रिसर्च से 77 प्रतिशत रिजल्ट सकारात्मक पाए गए , यद्यपि यह एक जटिल विषय है फिर भी, इससे बचने के लिए नकार देना कहां तक उचित है। यह सवाल जटिल है, फिर भी हमारे योगियों तथा महान दार्शनिकों, भगवान महावीर, भगवान बुद्ध, पतंजलि, योगी महा अवतार आदि  ने बड़ी सरलता से हल किया है।     

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सोमवार, 7 अक्टूबर 2024

मेरे भगवान भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव

विविधताओं भरे इस देश को एकात्मता के रंग में रंग देना कठिन कार्य  है, ।
   यही  कारण है कि यह कार्य करने योग्य है। क्योंकि आसान कार्य तो कोई भी कर सकता है, पर कठिन कार्य बिरले ही कर पाते हैं।
It is difficult to establish unity in diversity. Still, this is the need of the present era.
    Girish believes that Bhagat Singh, Rajguru and Sukhdev are no less than God for him. Let us know in his own words…
   मैं सरदार भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव को अपना भगवान मानता हूं,  वे न सिर्फ मेरे भगवान हैं बल्कि आप सबके भी भगवान हैं।
  आप सोच रहे होंगे कि - "एक नास्तिक को जो भगवान नाम के तत्व पर विश्वास नहीं रखता था कोई उसे भगवान कैसे कह सकता है ?"
  सच्चा नास्तिक ही भगवान है ।
यह सिद्धांत मैं पूरे दावे के साथ स्थापित करना चाहता हूं। क्योंकि जो स्वयं ईश्वर होता है, वह अपने आप को ईश्वर घोषित करने का कोई दावा नहीं करता।
  जो पूर्ण है वह ही ईश्वर है, जो आश्रित हैं वही तो हम हैं।
हम विनय करते हैं आग्रह करते हैं निवेदन करते हैं? ईश्वर अर्थात मुक्तिदाता आग्रह या निवेदन नहीं करता।

    जो भगवान होता है वह अपने भगवान होने पर भी विश्वास नहीं करता था ।
लोग मुझसे पूछेंगे ही - "भाई , इतना करीब से कैसे जानते हो भगवान को ?
कभी मिले हो क्या ?
जी हां बहुत करीब से जानता हूं, जो संरक्षक है, जो दाता है, जो प्रबंधक है जो मुक्ति दाता है वही तो भगवान है। और वह भगवान किसी को अपने भगवान होने का विश्वास नहीं दिलाता और न ही खुद विश्वास करता है।
   ईश्वर का अंतर्संबंध हर व्यक्ति से होता है।
  वो  सभी को लेकर चलता है सबके लिए सोचता है वही तो है सच्चा भगवान है मेरी नजर में। आपकी नज़र में कैसा दिखता है मुझे इस बात से सरोकार नहीं।
उसका अस्तित्व भौतिक न होने के कारण   विज्ञान की परिधि से बाहर है, विज्ञान केवल उन बातों की पड़ताल करता है... जो उसकी सीमारेखा में हैं।
ये मेरी स्वरंत्रता के अधिकार में है कि मुझे किसे ईश्वर मानना है किसे नहीं ।  
   बुद्ध ने  कह दिया था कि अपना दीपक खुद बन जाओ।
यह कह कर  बुद्ध सामाजिक जड़त्व को हटाना चाहते थे। कालांतर में कुछ लोगों ने नए किस्म की जड़ता से अनुराग स्थापित कर लिया।
  बुद्ध ने जात-पात के वर्गीकरण का विरोध किया। बुद्ध ने व्यक्तिश: आज़ादी का आग्रह किया था। बुद्ध वर्गीकरण एवम वर्ग - संघर्ष का विरोध करते थे।
   वे जात-पात के शिकंजे से मुक्ति दिलाने आए थे। आप उनको भगवान कह सकते हो तो हम भी भगत सिंह, राजगुरु, और सुखदेव को भगवान क्यों नहीं मान सकते ?
   बुद्ध के बाद , जातिवाद का ध्रुवीकरण हो गया। आयातित विचारधारा के लोग वर्गीकरण करते हैं,
वर्गों में  वैमनष्यता पर नैरेटिव स्थापित करते हुए वर्ग संघर्ष पैदा करते हैं।
मुझे प्रतीत हो रहा है कि महात्मा बुद्ध के सिद्धांतों के साथ भी ऐसा ही खिलवाड़ किया है।
   अंग्रेजों के आते-आते व्यवस्था और जटिल हो गई। सनातन का एकात्मक भाव तिरोहित हो गया।
  तब कई संकल्प पुत्रों ने जन्म लिया ,
वे न केवल भारत माता को दरिंदे अंग्रेजों से मुक्त करने आए थे  वरन सामाजिक एकात्मता स्थापित करने आए थे। 
  मां ने न जाने कितनी बार, भगत सिंह के दिए अरदास की होगी।
  भगत सिंह जानते थे कि - उनका लक्ष्य या क्या है, उन्हें क्या करना है, वे अपनी जिंदगी का मुस्तकबिल सुनिश्चित कर चुके थे।
  फांसी पर अपने मित्रों के साथ चढ़ने के पहले लाहौर जेल में की घटना ने मन को करुणा भाव से भर दिया। घटना कुछ इस प्रकार  है
लाहौर जेल में भगत सिंह की बैरक की साफ-सफाई करने वाले भंगी का नाम बोघा था। भगत सिंह उसको बेबे (मां) कहकर बुलाते थे।
जब कोई पूछता कि "भगत सिंह ये भंगी बोघा तेरी बेबे कैसे हुआ?"
तब भगत सिंह कहता, "मेरा मल-मूत्र या तो मेरी बेबे ने उठाया, या इस  पुरूष बोघे ने। बोघे में मैं अपनी बेबे (मां) देखता हूं। ये मेरी बेबे ही है।"
यह कहकर भगत सिंह बोघे को अपनी बाहों में भर लेता।
भगत सिंह जी अक्सर बोघा से कहते, "बेबे मैं तेरे हाथों की रोटी खाना चाहता हूँ।"
     पर बोघा अपनी जाति को याद करके झिझक जाता और कहता, "भगत सिंह तू ऊँची जात का सरदार, और मैं एक अदना सा भंगी, भगतां तू रहने दे, ज़िद न कर।"
   सरदार भगत सिंह भी अपनी ज़िद के पक्के थे, फांसी से कुछ दिन पहले जिद करके उन्होंने बोघे को कहा," बेबे अब तो हम चंद दिन के मेहमान हैं, अब तो इच्छा पूरी कर दे!"
    बोघे की आँखों में आंसू बह चले। रोते-रोते उसने खुद अपने हाथों से उस वीर शहीद ए आज़म के लिए रोटियां बनाई, और अपने हाथों से ही खिलाई।
  भगत सिह के मुंह में रोटी का गराई डालते ही बोघे की रुलाई फूट पड़ी। "ओए भगतां, ओए मेरे शेरा, धन्य है तेरी मां, जिसने तुझे जन्म दिया।"
और फिर भगत सिंह ने उसे अपने अंकपाश में भर लिया।
  भगत सिंह की इच्छा थी कि भारत समता मूलक समाज के स्वरूप में  स्थाई रूप से विकसित हो।
   मेरे देशवासियों , ध्यान रहे अगर हम अपने  राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, स्वार्थ को ध्यान में रखते हुए, सामाजिक वर्गीकरण और भेदभाव को बढ़ावा देंगे, तो हम वीर शहीदों- भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु के विरुद्ध  गंभीर अपराधी साबित  होंगे।
   जो राजनीतिज्ञ, व्यवसाई अथवा भारत का कोई भी नागरिक इस चेतावनी को सुन रहा है उसे अब अलर्ट रहने की जरूरत है।


@Youtube
Way after dad end. | ईश्वर कठोर नहीं होता  |
  🔗
https://youtu.be/CkrVepCLsXc?si=lfd28JFLcitCLiHY

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2024

ईश्वर न तो धोखेबाज है न ही निष्ठुर

 

 
"नियति अगर आपके जीवन से कुछ छीनती है तो चार गुना वापस करती है !"
    एक बार  मां ने  कहा था -"खोटे सिक्के को भी संभाल के रखो, यह कभी भी काम आ सकता है. 
  किसी की भी जिंदगी पूरी तरह से अनुपयोगी हो ही नहीं  सकती।
 क्या कभी आपने सोचा है कि जीवन चुनौतियां पूर्ण होता है। जीवन की चुनौतियों का सामना हमें स्वयं करना होता है। 
 आज हम एक ऐसी महिला की कहानी सुनाने जा रहे हैं जो दुनिया के लिए एक मिसाल बन गई। उसके साथ उन लोगों का भी जिक्र करेंगे जो सीमित साधनों में असीमित प्रयास करके सफल हो गए। 
विश्वास कीजिए यदि हम हम घोर निराशा के अंधेरे में होते हैं तो चुनौतियों का सामना नहीं कर सकते ।
सबसे पहले हमें आशावादी बनना पड़ेगा। 
      जैसे हेलेन केलर के माता-पिता ने खुद को आशावादी बनाकर रखा। आप जानते ही होंगे हेलेन केलर के बारे में।  
    जिसकी कहानी सुनकर कई  लोगों  ने अपने आप में सकारात्मक बदलाव कर लिए । 
 लगभग पूरी तरह से क्षमताहीन था हेलेन केलर का शरीर।
   वे  देख नहीं सकती थीं, सुन नहीं सकती थीं , और तो और वे बोल भी नहीं सकत थीं। 
   पर क्या हुआ कि वे विश्व के लिए प्रेरक और अमेरिका के लिए बहुमूल्य सिद्ध हो गई। 
  27 जून 1880 से 1 जून 1968 तक उन्होंने दुनिया को इतना कुछ समझा दिया, जो हजारों लोग मिलकर समाज को नहीं समझा पाते।
यूनाइटेड स्टेट ऑफ़ अमेरिका टसकंबिया अल्बामा में जन्म लेने वाली जन्म के 19 महीने के बाद सुनने बोलने, और देखने की की शक्ति ही को देती हैं ।
  हेलेन केलर , और लुई ब्रेल की कहानी भी समानांतर रूप से लगभग  ऐसी ही है।
 हेलेन केलर के अलावा लुईस ब्रेल देख नहीं सकते थे। 
  उन्होंने ब्रेल लिपि का विकास किया। और दुनिया भर के नेत्र दिव्यांगों को ब्रेल लिपि का अनुपम उपहार दे दिया।
नियति किसी से कुछ भी छीनती है तो उससे  कई गुना अधिक वापस भी करती है। 
  हेलेन केलर, Louis brail आदि से जितना भी छीना था नियति ने , उससे कई गुना अधिक वापस करना पड़ा था। 
    विश्व के लिए हेलेन केलर ने  जो प्रतिमान स्थापित कर दिए ,  उन्हें देखकर लगता है कि -"यूनाइटेड स्टेट ऑफ़ अमेरिका यूं ही नहीं समृद्ध हुआ है..!"
   विश्वास कीजिए जब भी किसी हताश जिंदगी को  कोई रास्ता नहीं मिला , वहीं से हताश जिंदगी के लिए नए रास्ते खुलने लगते हैं। 
 उन्हीं अपरिचित  रास्तों पर चलकर लोग  वहां पहुंच जाते हैं   जहां  नियति ने बिखरी जिंदगीयों को  पुनर्निर्माण के ऐसे ऐसे संसाधन दिए जो बड़े कीर्तिमान स्थापित करने में महत्वपूर्ण बन गए। 

 मुझे याद आ रहा है   एक बार एक मां अपने बच्चे को लेकर मेरे संस्थान में आई थीं। बच्चा दिव्यांग था। बच्चा दुनिया को जानना चाह रहा था, परंतु मां के आंसू थे। मां आखिर मां होती है। 
करुणा से सराबोर मां ने कहा  - "ईश्वर ने किसी जन्म का दंड मुझे दिया है।"
 मां के इस वाक्य को सुनकर मुझे लगा कि वह ईश्वर पर आस्था रखने वाली मां हैं।
उसकी मनोदशा देखकर मैंने उसे हेलेन केलर के जीवन के बारे में बताया। और यह भी बताया कि -" आप जिस  ईश्वर पर आस्था रखती है, वही ईश्वर रास्ते बनाता है। वह किसी को दंड नहीं देता। 
  अगर ईश्वर कठोर होता तो - हेलेन केलर के माता-पिता को एनि सुलिव्हान जैसी टीचर नहीं मिलती। ईश्वर की कृपा ने सूरदास को स्थापित कर दिया,। उसी ईश्वर ने नेत्र दिव्यांग संत रामभद्राचार्य को संपूर्ण वेदों और शास्त्रों का अध्ययन कर दिया।
   इतना ही नहीं, निक बुजीचिच नाम के व्यक्ति के चर्च तक पहुंचने के लिए दोनों पैर ही  नहीं नहीं दिए हैं , 
   प्रार्थना करने के लिए उसके पास दो हाथ भी नहीं हैं।
   फिर भी वह  दुनिया को ईश्वर के अस्तित्व का प्रमाण दे रहा है।
   ईश्वर न तो धोखेबाज है न ही निष्ठुर 
अगर ऐसा होता तो  दुनिया महान वैज्ञानिक  स्टीफ़न विलियम हाकिंग्स को दुनिया में नहीं भेजता। 
  आपका दुख तो बहुत थोड़ा सा है, आपका बेटा तो बच्चा जरा सा ऊंचा सुनता है, उनका क्या जिनके बच्चों की स्थिति आपके बच्चे से भी ज्यादा दयनीय है।
    दिव्यांग बालक की मां  जब अंकित कहार से मिली तब उसे पक्का विश्वास हो गया कि ईश्वर धोखेबाज और निष्ठुर नहीं है न। अगर ईश्वर धोखेबाज होता तो  अंकित कहार जैसा बच्चा जिसके शरीर में निरंतर कंपन बना रहता है , वह मूर्तिकला और चित्रकला कैसे कर पाता , कैसी वह जे जे स्कूल ऑफ़ आर्ट के स्पेशल ट्रेनिंग प्रोग्राम का हिस्सा बनता ?
 अपने गीतों से मंत्र मुक्त कर देने वाली
 नेत्र दिव्यांग सखी जैन, अंजली, बाल श्री विजेता संत लाल पाठक पूरे उत्साह के साथ भारत के विकास में कैसे सहयोगी हो पाते।
   अंत़तः बच्चों की मां को यह विश्वास हो गया कि ईश्वर न तो निर्दयी है , और न ही धोखेबाज।
   जीवन कभी भी सीधी रेखा पर नहीं चलता। 
हर एक जीवन को अगर हम रेखा मान लें तो इसे सरल रेखा के रूप में आप कभी नहीं देखेंगे। 
  जीवन एक ग्राफ है। कभी ऊपर तो कभी नीचे। 
और यही मजेदार बात है जीवन की।
   बुद्ध ने जीवन के इस ग्राफ को देखकर महान व्रत ले लिया। 
   कर्ण सोचता था कि वह ही दुनिया का सबसे दुखी व्यक्ति है। यह विचार उसने कृष्ण के समक्ष व्यक्त भी किया। तभी कृष्ण फूट पड़े और बोले - "प्रिय कर्ण मेरा जन्म तो कारागार में हुआ है। 
जन्म लेते ही मुझे भी तुम्हारी तरह मां से जुदा होना पड़ा।
   मां के जीवित रहने के बावजूद मुझे दूसरी मां के साथ रहना पड़ा। 
   सच है दुख न तो छोटा होता है न ही बड़ा होता है। एक दूसरे के दुखों और सुखों के बीच प्रतियोगिता नहीं हो सकती। 
  इन इन दुखों पर विजय पाने के लिए या तो कृष्ण बनना पड़ता है या फिर बुद्ध..!

मंगलवार, 17 सितंबर 2024

पूर्वजों के प्रति कृतज्ञ की अभिव्यक्ति के 15 दिन "श्राद्ध पक्ष" और तर्क वादियों का चिंतन..!


 

 



  आप जानते ही हैं कि सनातनियों के लिए अति महत्वपूर्ण पितृपक्ष 18 सितंबर 2024 से प्रारंभ हो चुका है। पितृपक्ष सनातनियों के लिए बेहद पावन और भावात्मक होता है

पूरे 15 दिन की अवधि में परिवार में स्वच्छता एवं व्यक्तिगत मानसिक शुद्धता का विशेष रूप से ध्यान रखा जाता है। यह परंपरा प्राचीन काल से जारी है।

.  इससे पहले कि हम श्राद्ध पक्ष के बारे में चर्चा करें आइये  हम मनुष्य के जीवन एवं उसकी आत्मा पर संक्षिप्त चर्चा करते हैं।

6.  मानव  जीव के अस्तित्व को  वैज्ञानिकों एवम तर्क वादियों  से स्वीकृति नहीं है।

7.  तर्क वादियों एवं वैज्ञानिकों के विचार से न तो  जीवात्मा होती  है और न ही  पुनर्जन्म है । कर्म फल के सिद्धांत से भी वे सहमत नहीं होते। कुछ विद्वान तर्कवादी आत्मा के अस्तित्व को स्वीकारते अवश्य हैं

  जो व्यक्ति जीवात्मा और परमात्मा को नहीं मानते उन्हें हम नास्तिक कहते हैं। जाबाली , चार्वाक जैसी नास्तिक  विचार परंपराएं  जैन दर्शन, बौद्ध-दर्शन इनमे सर्वोपरि हैं.

आस्तिक परंपराएं और मान्यताएं जीव के अस्तित्व को स्वीकृति देतीं है।   हम सब भी  मानते हैं कि शरीर के मर जाने के बावजूद भी  जीव अस्तित्व में रहता है।

10.   जिनने  गीता पढ़ी है या उसके बारे में कुछ भी जानकारी रखते हैं वे  यह  जरुर जानते हैं कि युगपुरुष कर्मयोगी श्री कृष्ण ने आत्मा अर्थात जीव के बारे में क्या कहा था ?

11.   आत्मा  जो अजर है अमर है , शरीर से मुक्त होते ही  वह किसी न किसी रूप में ब्रह्मांड में उपस्थित है। आत्मा पर किसी भी नकारात्मक या सकारात्य्मक किसी भी स्थिति का प्रभाव नहीं होता।

 हम सब जानते हैं कि- आत्मा जब  शरीर में होती है तो शरीर को जीवंतता देती है । विश्व के अधिकांश  मतवालंबी इस तथ्य को मानते हैं। अब्राहमिक संप्रदायों में पुनर्जन्म का कॉन्सेप्ट तो नहीं है परंतु जीव द्वारा किये गए कार्यों के अंतिम के गुण-दोष के आधार पर निर्णय ईश्वर द्वारा निर्णय लेने की अवधारणा अवश्य है । प्राणी को स्वर्ग भेजना है या नरक यह अंतिम निर्णय के वक्त ईश्वर ही करेंगें.  

श्राद्ध् आयोजन के लिए क्या निर्धारित है..?

   नीति शास्त्र कहता है कि - जो आपके प्रति कुछ भी सकारात्मक कार्य करें तो उनके प्रति हमें कृतज्ञापित करनी चाहिए।

भारतीय जीवन दर्शन एवं सामाजिक परंपराओं के अनुसार हममें हर प्राणी के प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति करनी चाहिए। यह धार्मिक आज्ञा मात्र नहीं है। बल्कि यह एक सामाजिकता का भी उदाहरण है।

आपसे निवेदन है कि आप इस पॉडकास्ट में अंत तक बने रहिए हम आपको श्राद्ध पक्ष के रहस्य से परिचित करते हुए तर्कवादियों विचारों का सतर्कता  से तथ्यात्मक खंडन कर रहें हैं  -

सनातन परंपराओं के अनुसार हम  श्राद्ध पक्ष के संबंध विचार करते हैं तो हम पाते हैं की-

·      पूर्वजों के स्मृति दिवस मनाने के लिए एक अवधि निर्धारित है. यह अवधि 15 दिवस में पूर्ण होती है. हिन्दी कैलेण्डर के अनुसार गणेशोत्सव के समापन के पश्चात प्रारम्भ प्रथम दिवस से अंतिम दिवस तक अर्थात “पितृ-मोक्ष अमावश्या” तक की अवधि में जिस तिथि में पूर्वज का देहावसान होता है उस दिन से “पितृ- मोक्ष अमावश्या” तक पिता या माता  की स्मृति में जल अर्पण किया जाता है. जिसे तर्पण कहते हैं , इस प्रक्रिया में अलग अलग स्थान के अनुसार अलग अलग तरीके अपनाए जाते हैं.

·      स्मृति दिवस पर तर्पण करते समय पिता या माता के अतिरिक्त देवताओं, ऋषियों, भीष्म-पितामह,  के अलावा श्राद्ध कर्ता द्वारा  अपने कुटुंब के , सभी पूर्वजों, समकालीन भाइयों, बहनों , चाचाओं, मित्रों,  ज्ञात या अज्ञात लोगों, तथा प्रत्येक व्यक्ति के लिए सम्मान दिया जाता है जो अब इस दुनियां में नहीं हैं.

   पितृपक्ष का उद्देश्य क्या है

·      दिवंगतों को   मुख्य रूप से केवल पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करना है।

·       "15 दिनों तक अपने दिवंगत पूर्वजों का स्मरण  करने की प्राथमिक शर्त पुत्र तथा पुत्र वधू तथा बच्चों को बंधनकारी होता है कि श्राद्ध पक्ष में घर को साफ सुथरा एवं आसपास के वातावरण मैं स्वच्छता बनाए रखना ।

·      आप सोचते होंगे कि श्राद्ध पक्ष में क्या केवल उनका स्मरण किया जाना है जो आपके रिश्तेदार हैं ऐसा नहीं है।आप जब तर्पण की संपूर्ण प्रक्रिया देखते हैं तब आपको पता चलता है कि - देवता, ऋषि, सहित उन सभी के प्रति कृतज्ञता व्यक्ति की जाती है जो इस पृथ्वी पर मानव स्वरूप में जन्म लेते हैं और मरते हैं। आपने सुना होगा जब कभी तर्पण किया जाता है तो अपने निकटतम रक्त संबंधियों से लेकर रिश्तेदारों तक के नाम का उल्लेख किया जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि हम जिनका भी सम्मान करते हैं उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और प्रतीक स्वरूप उनके लिए जल अर्पित करते हैं।

·      इसके अलावा गृहस्थ साधक प्रत्येक प्राणी मात्र के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है। तर्पण करते वक्त पुरोहित ऋषि मुनियों के साथ-साथ भीष्म पितामह सहित ज्ञात अज्ञात सभी जीवों उल्लेख करते हुए उनका सम्मान व्यक्त  करते हैं।

श्राद्ध का प्रभाव

·      श्राद्ध प्रक्रिया का पालन करने से हमारे मस्तिष्क में कृतज्ञता की भावना  मजबूत होती है। हम कृतज्ञता उन पर व्यक्त करते हैं जिन पर श्रद्धा और स्नेह होता है।

·      श्राद्ध जैसे वार्षिक रिचुअल की पुनर्रावृत्ति से मनो वैज्ञानिक तौर पर हम पवित्रता एवं कृतज्ञता के भाव को अपनी आदत में आत्मसात  कर सकते हैं।

क्या श्राद्ध में बहुत से ब्राह्मण को खीर खिलाने की बाध्यता है.?

·      सनातन धर्म में धार्मिक रिचुअल्स बाध्यता के साथ पालन करने का कोई आदेश नहीं है. भारत एक कृषि-प्रधान देश है जहां गोवंश से दूध, खेतों से चावल आदि विपुल मात्रा में उपलब्ध होता है. जहां चावल की उपज नहीं होती वहां स्थानीय अनाज से बने खाद्य पदार्थ खिलाने का प्रचलन है.

·      श्राद्ध का संबंध पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति पर आधारित है. न कि किसी ब्राह्मण या ब्राह्मणों को भोजन कराने मात्र से ,

·      श्राद्ध में केवल चार  पत्तल/थालियां परोसी जाती हैं. एक पुरोहित के लिए, दूसरी गाय के लिए, तीसरी चींटी/कीट पतंगों के लिए, चौथी कौए के लिए.

·      पुरोहित आपको मार्गदर्शन देकर प्रक्रिया पूर्ण कराता है, गाय प्राचीन  ग्रामीण भारत से अब तक जीवन का आधार है, चींटी /पतंगे तथा कौआ आदि इको-सिस्टम का हिस्सा हैं,

·      क्या श्राद्ध में बड़ी संख्या में  भोजन कराना चाहिए 

·      श्राद्ध करना ही बाध्यता नहीं है तो यह प्रश्न बेमानी है. प्रश्न केवल इतना है कि यदि आप अपने दिवंगत  पूर्वजों/ सहयोगियों , तथा सम्पूर्ण मानवता के प्रति सम्मान एवं  करुणा भाव रखते हैं तो उनको याद करना चाहेंगे.

·      क्या श्राद्ध कुरीति है... 

·      सत्यार्थ-प्रकाश के 11वें सम्मुल्लास में स्वामी दयानंद जी लिखा है कि –“पुरखों को दिया गया पानी तर्पण भोजनादि उन तक नहीं पहुंचता. !” भौतिक रूप से इस तथ्य को नहीं नकारना चाहिए . इससे मैं सहमत हूँ.

·      आचार्य रजनीश जैसे तर्क वादी "श्राद्ध पक्ष को पुरोहितों द्वारा बनाई गई रूढ़िवादी परंपरा मानते हैं”

         तर्कशास्त्रियों की दृष्टि उतना ही देखती है जितना वह देख पाती है। उन्हौने इसके पीछे के मनोविज्ञान को शायद ही समझा हो.

वास्तव में  श्राद्ध रूढ़िवाद नहीं है बल्कि एक सोशल इवेंट है। जो एक व्यक्तिगत-अभ्यास एवं सामूहिक होने पर सोशल इवेंट है.

जिसमें  में हम अपने जहां एक ओर लौकिक जीवन के कर्तव्यों का निर्वहन करते नजर आते हैं, वहीँ दूसरी ओर श्रद्धा , कृतज्ञता एवं आभारी होने की भावना से स्वयम को भरा महसूस करते हैं. ।

श्राद्ध पक्ष में पंडितों को भोजन करना उद्देश्य मात्र नहीं है, आर्थिक रूप से गरीब लोग के लिए कर्ज लेकर श्राद्ध करने की बाध्यता नहीं है।

       सामाजिक विज्ञान  सामूहिक भावात्मक विकास के लिए प्रेरित करता  है।

सामाजिक विज्ञान नीति विज्ञान और मनोविज्ञान  हमेशा जन्म से लेकर मृत्यु तक की गतिविधियों का अध्ययन करता है तथा मार्गदर्शन प्रदान करता है।

हमारा सामाजिक जीवन मानव प्रजाति की  राष्ट्र, समाज, कुटुंब, परिवार एवं वैयक्तिक उत्कर्ष में सहायक होता है.

पूर्वजों ने हमें यही सिखाया। इसके परिणाम भी सुखद है।

हम ऐसे ही बदलाव लाने के लिए अपने पूर्वजों को धन्यवाद कहते हैं। धन्यवाद कहने की इस प्रक्रिया को श्राद्ध पक्ष में भली भांति दोहराते हैं .

इस प्रकार हम धन्यवाद का  प्रकटीकरण करके  कल्चरल निरंतरता को गतिमान बनाए रखते हैं ।

       पृथ्वी के प्रत्येक मानव समूह की नई पीढ़ी ने  अपने अपने तरीके से पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता करना प्रारंभ कर दिया।

अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना कैसे कोई पाखंड हो सकता है । अब आप ही बताइए यह अवैज्ञानिक  कैसे हैं?

तर्क वादियों के पुरोधा प्रोफेसर  चंद्र मोहन जैन ने  पितृपक्ष और श्राद्ध  पूरी ताकत से खंडन किया। खंडन करना उनकी  अपनी जगह वैचारिक प्रक्रिया है लेकिन उन्होंने इसका उपहास भी किया है बिना यह अनुमान लगाए कि श्राद्ध जैसे रिचुअल  के पीछे का सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, आधार क्या है ?

विगत कई दिनों से उनके अनुसरण करने वाले उनका जन्म दिवस  उनके  स्मृति दिवस पर महोत्सवों की कवायद भी कर रहे हैं।

जैसे मूर्ति पूजा का विरोध करने वाले किसी व्यक्ति की मूर्तियां बना बना कर उनका पूजन किया जाए तब कैसा लगेगा।

पैगंबर मोहम्मद ने मूर्ति पूजा को मान्यता नहीं दी उनकी कोई मूर्ति इस्लाम मानने वाले कभी नहीं रखते न ही वे उसकी कल्पना करते।

प्रोफेसर रजनीश  को यह भ्रम था कि उनकी शिक्षा के बाद श्राद्ध बंद हो जाएंगे। ऐसा कुछ  हुआ नहीं, इसके विपरीत आप उनका ही श्राद्ध मनाया जाने लगा।

फर्क जरा सा इतना है कि -"अब सरकारी सहायता मांग कर, एवं स्वयं का धन एकत्र कर जनता द्वारा उनकी याद में श्राद्ध मनाने का प्रयास होने लगा!"

    कम्युनों में ओशो का जन्मदिन, स्मृति दिवस मनाया जाता है। यूं तो दुनिया भर में लोगों के   स्मृति दिवस  मनाए जाते हैं ,

इसमें बुराई क्या है । पंडितों को खीर खिलाने के खिलाफ बोलने वाले अकूत संपदा के स्वामी  99 रोल्स-रोयस के मालिक आचार्य रजनीश के डिवोटी मुझे तरंग आडिटोरियम के आसपास आयोजित गतिविधियों में तरंगित अवास्त्य्हा  के पीछे अद्भुत अवस्था में मिले थे , कदाचित सनातनी श्राद्ध में ऐसा नहीं  होता .

जब कोई  श्राद्ध पक्ष  सवाल उठाता है तो मुझे लगता है कि वह  महापुरुषों के  स्मृति दिवसों पर भी सवाल उठाता ही होगा.

हिंदुत्व पर सवाल उठाने वालों से एक सवाल इस तरह पूछना चाहता हूँ....

वक्त ज़ाया न कर, मुझ को आजमाने में ।

बहुत से लोग हैं ,  मेरी तरह  ज़माने में ।।

भेज न मुझको,सवालों पे सवालों की रसद

भेज हों उतने ही जितने,  तेरे बारदाने में ।।

 

 

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