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गुरुवार, 3 अप्रैल 2025
संशोधित वक्फ बिल पास होने के बाद का भारत: एक विश्लेषण

भूमि संबंधी कानूनों की मौजूदगी में वक्फ कानून का औचित्य: एक विश्लेषण

शुक्रवार, 21 मार्च 2025
किशोर उम्र की मुश्किलें !
#### शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण
किशोरावस्था में हार्मोनल बदलाव, जैसे टेस्टोस्टेरोन और एस्ट्रोजन का बढ़ना, यौनिक उत्तेजना को जन्म देता है, जिसे समझने और नियंत्रित करने में किशोर अक्सर असमर्थ होते हैं। यह उत्तेजना कई बार सेक्स की लत या असुरक्षित यौन व्यवहार का कारण बनती है। ड्रग्स और मादक पदार्थों का सेवन जिज्ञासा, पीयर प्रेशर या तनाव से बचने की चाह से शुरू होता है। भारत में संयुक्त परिवारों का दबाव, पढ़ाई की प्रतिस्पर्धा और यूरोप में व्यक्तिवादिता व सोशल मीडिया का प्रभाव इन समस्याओं को बढ़ाता है।
घर के प्रति विद्रोही व्यवहार और असंयमित क्रोध हार्मोनल असंतुलन, पारिवारिक तनाव और संवाद की कमी से उत्पन्न होते हैं। अनियमित दिनचर्या, जंक फूड, नींद की कमी और शारीरिक गतिविधियों में कमी शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। मानसिक स्वास्थ्य पर पढ़ाई, दोस्तों और सोशल मीडिया का दबाव तनाव, चिंता और अवसाद को बढ़ाता है। इन सबके बीच, किशोरों का आवेगपूर्ण व्यवहार और निर्णय लेने में असमर्थता उन्हें अपराध की ओर भी ले जा सकती है।
#### भारत और यूरोपीय देशों के किशोरों का तुलनात्मक अध्ययन (आंकड़ों सहित)
- **ड्रग्स की लत**: भारत में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय (2019) के अनुसार, मादक पदार्थों का सेवन करने वालों में 13% की उम्र 20 साल से कम है। NCRB 2022 के अनुसार, नशे से जुड़े अपराधों में किशोरों की संलिप्तता बढ़ी है। यूरोप में, EMCDDA 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, 15-19 आयु वर्ग के 17% किशोरों ने नशीले पदार्थों का सेवन किया।
- **सेक्स की लत और यौन व्यवहार**: भारत में UNFPA 2020 के अनुसार, 15-19 आयु की 6% किशोर लड़कियां गर्भवती होती हैं। यूरोप में, यूरोस्टेट 2022 के अनुसार, 15-19 आयु वर्ग में 10% किशोरों ने यौन संचारित रोगों का सामना किया।
- **विद्रोही व्यवहार और क्रोध**:
भारत में NCRB 2022 के अनुसार, किशोर अपराधों में 40% मामले पारिवारिक विवाद से शुरू होते हैं। यूरोप में, FRA 2021 के अनुसार, 12% किशोरों ने माता-पिता के खिलाफ हिंसक व्यवहार दिखाया।
- **अपराध**: भारत में NCRB 2022 के अनुसार, किशोर अपराधों में 5% की वृद्धि हुई। यूरोप में, यूरोस्टेट 2022 के अनुसार, किशोर अपराध दर 8% है।
#### दुष्परिणाम
शारीरिक स्वास्थ्य की उपेक्षा से मोटापा, मधुमेह और कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली विकसित होती है। ड्रग्स की लत से शारीरिक और मानसिक क्षति होती है, जबकि सेक्स की लत असुरक्षित यौन संबंधों से गंभीर परिणाम लाती है। विद्रोही व्यवहार और असंयमित क्रोध किशोरों को परिवार और समाज से दूर करता है, जिससे अपराध और आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती है। भारत में NCRB 2022 के अनुसार, किशोरों में आत्महत्या के मामले बढ़े हैं, और पलायन भी ग्रामीण क्षेत्रों में एक समस्या है। यूरोप में आत्महत्या और अपराध व्यक्तिगत अलगाव से अधिक जुड़े हैं।
#### निदान
शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के प्रबंधन के लिए भारतीय योग अभ्यास, खेलकूद और बौद्धिक अभ्यास प्रभावी समाधान हैं।
- **शारीरिक स्वास्थ्य**: संतुलित आहार (प्रोटीन, विटामिन, खनिज) और रोजाना 30-40 मिनट की शारीरिक गतिविधि जरूरी है। **खेलकूद** जैसे क्रिकेट, फुटबॉल या बैडमिंटन न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को बढ़ाते हैं, बल्कि हार्मोनल संतुलन और तनाव को भी कम करते हैं। **भारतीय योग अभ्यास** जैसे सूर्य नमस्कार, प्राणायाम और भस्त्रिका शारीरिक लचीलापन, ऊर्जा और मानसिक शांति प्रदान करते हैं। नींद के 7-8 घंटे सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
- **मानसिक स्वास्थ्य**: **योग और ध्यान** (जैसे अनुलोम-विलोम और माइंडफुलनेस) तनाव, क्रोध और आवेग को नियंत्रित करते हैं। **बौद्धिक अभ्यास** जैसे **चित्रकारी** भावनाओं को व्यक्त करने का रचनात्मक माध्यम है, **भाषण कला** आत्मविश्वास बढ़ाती है, **कविता लेखन** मन को शांत और केंद्रित करती है, और **संगीत साधना** (गायन या वादन) मानसिक तनाव को कम करती है। ये गतिविधियां ड्रग्स और सेक्स की लत से ध्यान हटाकर सकारात्मक दिशा प्रदान करती हैं।
- **विशिष्ट समस्याओं के लिए**: ड्रग्स की लत से बचाव के लिए जागरूकता अभियान और पुनर्वास केंद्रों की पहुंच बढ़ानी चाहिए। सेक्स की लत और यौनिक उत्तेजना को नियंत्रित करने के लिए उम्र के अनुकूल यौन शिक्षा और माता-पिता से खुली बातचीत जरूरी है। विद्रोही व्यवहार और क्रोध को नियंत्रित करने के लिए परिवार में संवाद, स्कूलों में काउंसलिंग और मेंटरशिप प्रोग्राम शुरू करने चाहिए। अपराध और आत्महत्या से बचाव के लिए हेल्पलाइन (जैसे चाइल्डलाइन 1098) और सामुदायिक सहायता को मजबूत करना होगा। गंभीर मामलों में मनोवैज्ञानिक की सलाह लेना उचित है।
#निष्कर्ष
किशोर अवस्था में शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का प्रबंधन एक जटिल लेकिन आवश्यक कार्य है। ड्रग्स, सेक्स की लत, विद्रोही व्यवहार, क्रोध और अपराध जैसी समस्याएं किशोरों को गलत रास्ते पर ले जा सकती हैं। भारत और यूरोप में इन समस्याओं के कारण और प्रभाव भिन्न हैं, लेकिन दोनों जगह भारतीय योग, खेलकूद और बौद्धिक अभ्यास जैसे चित्रकारी, भाषण कला, कविता लेखन और संगीत साधना स्वास्थ्य प्रबंधन के अभिन्न अंग बन सकते हैं। ये न केवल शारीरिक और मानसिक संतुलन बनाए रखते हैं, बल्कि किशोरों को सकारात्मक दिशा में प्रेरित करते हैं। परिवार, समाज और सरकार के संयुक्त प्रयास से यह पीढ़ी स्वस्थ, सशक्त और जिम्मेदार बन सकती है।
#किशोरस्वास्थ्य
#मानसिकस्वास्थ्य
#शारीरिकस्वास्थ्य
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#किशोरावस्था
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#किशोरअपराध
#आत्महत्यारोकथाम
#संगीतसाधना
#कवितालेखन

बुधवार, 19 मार्च 2025
सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर की कहानी,

भारत में विवाह विच्छेद कारण और निदान

शनिवार, 11 जनवरी 2025
Live -|| Day-1 || नार्मदीय ब्राह्मण समागम 2025 || 11-01-2025 || इंदौर लाइव

गुरुवार, 17 अक्टूबर 2024
Mysteries of the soul | आत्मा होती ही नहीं ?
Our top Videos./ Podcast
https://youtu.be/okBsbgXv_l8 https://youtu.be/GdQDQIEZDKM https://youtu.be/WPRcuecDqxI https://youtu.be/AnQA20LQPDE https://youtu.be/aXFO15hSZfY https://youtu.be/SX3HIRjJtLk --- #पुनर्जन्म #प्राण #प्राणी #जीव #पॉडकास्ट Disclaimer: The voice used in this video is cloned voice of Dr. Shipra Sullere with her permission.This use is permitted by YouTube.This cloned voice is not used for any other purpose. --- Mysteries of the soul | आत्मा होती ही नहीं ? आलेख : गिरीश बिल्लौरे मुकुल स्वर : डॉ. शिप्रा सुल्लेरे पार्श्व संगीत : अनुष्का सोनी तकनीकी सहयोग: सिद्धार्थ गौतम
सोमवार, 7 अक्टूबर 2024
मेरे भगवान भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव
यही कारण है कि यह कार्य करने योग्य है। क्योंकि आसान कार्य तो कोई भी कर सकता है, पर कठिन कार्य बिरले ही कर पाते हैं।
It is difficult to establish unity in diversity. Still, this is the need of the present era.
Girish believes that Bhagat Singh, Rajguru and Sukhdev are no less than God for him. Let us know in his own words…
मैं सरदार भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव को अपना भगवान मानता हूं, वे न सिर्फ मेरे भगवान हैं बल्कि आप सबके भी भगवान हैं।
आप सोच रहे होंगे कि - "एक नास्तिक को जो भगवान नाम के तत्व पर विश्वास नहीं रखता था कोई उसे भगवान कैसे कह सकता है ?"
सच्चा नास्तिक ही भगवान है ।
यह सिद्धांत मैं पूरे दावे के साथ स्थापित करना चाहता हूं। क्योंकि जो स्वयं ईश्वर होता है, वह अपने आप को ईश्वर घोषित करने का कोई दावा नहीं करता।
जो पूर्ण है वह ही ईश्वर है, जो आश्रित हैं वही तो हम हैं।
हम विनय करते हैं आग्रह करते हैं निवेदन करते हैं? ईश्वर अर्थात मुक्तिदाता आग्रह या निवेदन नहीं करता।
जो भगवान होता है वह अपने भगवान होने पर भी विश्वास नहीं करता था ।
लोग मुझसे पूछेंगे ही - "भाई , इतना करीब से कैसे जानते हो भगवान को ?
कभी मिले हो क्या ?
जी हां बहुत करीब से जानता हूं, जो संरक्षक है, जो दाता है, जो प्रबंधक है जो मुक्ति दाता है वही तो भगवान है। और वह भगवान किसी को अपने भगवान होने का विश्वास नहीं दिलाता और न ही खुद विश्वास करता है।
ईश्वर का अंतर्संबंध हर व्यक्ति से होता है।
वो सभी को लेकर चलता है सबके लिए सोचता है वही तो है सच्चा भगवान है मेरी नजर में। आपकी नज़र में कैसा दिखता है मुझे इस बात से सरोकार नहीं।
उसका अस्तित्व भौतिक न होने के कारण विज्ञान की परिधि से बाहर है, विज्ञान केवल उन बातों की पड़ताल करता है... जो उसकी सीमारेखा में हैं।
ये मेरी स्वरंत्रता के अधिकार में है कि मुझे किसे ईश्वर मानना है किसे नहीं ।
बुद्ध ने कह दिया था कि अपना दीपक खुद बन जाओ।
यह कह कर बुद्ध सामाजिक जड़त्व को हटाना चाहते थे। कालांतर में कुछ लोगों ने नए किस्म की जड़ता से अनुराग स्थापित कर लिया।
बुद्ध ने जात-पात के वर्गीकरण का विरोध किया। बुद्ध ने व्यक्तिश: आज़ादी का आग्रह किया था। बुद्ध वर्गीकरण एवम वर्ग - संघर्ष का विरोध करते थे।
वे जात-पात के शिकंजे से मुक्ति दिलाने आए थे। आप उनको भगवान कह सकते हो तो हम भी भगत सिंह, राजगुरु, और सुखदेव को भगवान क्यों नहीं मान सकते ?
बुद्ध के बाद , जातिवाद का ध्रुवीकरण हो गया। आयातित विचारधारा के लोग वर्गीकरण करते हैं,
वर्गों में वैमनष्यता पर नैरेटिव स्थापित करते हुए वर्ग संघर्ष पैदा करते हैं।
मुझे प्रतीत हो रहा है कि महात्मा बुद्ध के सिद्धांतों के साथ भी ऐसा ही खिलवाड़ किया है।
अंग्रेजों के आते-आते व्यवस्था और जटिल हो गई। सनातन का एकात्मक भाव तिरोहित हो गया।
तब कई संकल्प पुत्रों ने जन्म लिया ,
वे न केवल भारत माता को दरिंदे अंग्रेजों से मुक्त करने आए थे वरन सामाजिक एकात्मता स्थापित करने आए थे।
मां ने न जाने कितनी बार, भगत सिंह के दिए अरदास की होगी।
भगत सिंह जानते थे कि - उनका लक्ष्य या क्या है, उन्हें क्या करना है, वे अपनी जिंदगी का मुस्तकबिल सुनिश्चित कर चुके थे।
फांसी पर अपने मित्रों के साथ चढ़ने के पहले लाहौर जेल में की घटना ने मन को करुणा भाव से भर दिया। घटना कुछ इस प्रकार है
लाहौर जेल में भगत सिंह की बैरक की साफ-सफाई करने वाले भंगी का नाम बोघा था। भगत सिंह उसको बेबे (मां) कहकर बुलाते थे।
जब कोई पूछता कि "भगत सिंह ये भंगी बोघा तेरी बेबे कैसे हुआ?"
तब भगत सिंह कहता, "मेरा मल-मूत्र या तो मेरी बेबे ने उठाया, या इस पुरूष बोघे ने। बोघे में मैं अपनी बेबे (मां) देखता हूं। ये मेरी बेबे ही है।"
यह कहकर भगत सिंह बोघे को अपनी बाहों में भर लेता।
भगत सिंह जी अक्सर बोघा से कहते, "बेबे मैं तेरे हाथों की रोटी खाना चाहता हूँ।"
पर बोघा अपनी जाति को याद करके झिझक जाता और कहता, "भगत सिंह तू ऊँची जात का सरदार, और मैं एक अदना सा भंगी, भगतां तू रहने दे, ज़िद न कर।"
सरदार भगत सिंह भी अपनी ज़िद के पक्के थे, फांसी से कुछ दिन पहले जिद करके उन्होंने बोघे को कहा," बेबे अब तो हम चंद दिन के मेहमान हैं, अब तो इच्छा पूरी कर दे!"
बोघे की आँखों में आंसू बह चले। रोते-रोते उसने खुद अपने हाथों से उस वीर शहीद ए आज़म के लिए रोटियां बनाई, और अपने हाथों से ही खिलाई।
भगत सिह के मुंह में रोटी का गराई डालते ही बोघे की रुलाई फूट पड़ी। "ओए भगतां, ओए मेरे शेरा, धन्य है तेरी मां, जिसने तुझे जन्म दिया।"
और फिर भगत सिंह ने उसे अपने अंकपाश में भर लिया।
भगत सिंह की इच्छा थी कि भारत समता मूलक समाज के स्वरूप में स्थाई रूप से विकसित हो।
मेरे देशवासियों , ध्यान रहे अगर हम अपने राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, स्वार्थ को ध्यान में रखते हुए, सामाजिक वर्गीकरण और भेदभाव को बढ़ावा देंगे, तो हम वीर शहीदों- भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु के विरुद्ध गंभीर अपराधी साबित होंगे।
जो राजनीतिज्ञ, व्यवसाई अथवा भारत का कोई भी नागरिक इस चेतावनी को सुन रहा है उसे अब अलर्ट रहने की जरूरत है।
@Youtube
Way after dad end. | ईश्वर कठोर नहीं होता |
🔗
https://youtu.be/CkrVepCLsXc?si=lfd28JFLcitCLiHY

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2024
ईश्वर न तो धोखेबाज है न ही निष्ठुर

मंगलवार, 17 सितंबर 2024
पूर्वजों के प्रति कृतज्ञ की अभिव्यक्ति के 15 दिन "श्राद्ध पक्ष" और तर्क वादियों का चिंतन..!
आप
जानते ही हैं कि सनातनियों के लिए अति महत्वपूर्ण पितृपक्ष 18
सितंबर 2024 से प्रारंभ हो
चुका है। पितृपक्ष सनातनियों के लिए बेहद पावन और भावात्मक होता है
पूरे
15 दिन की अवधि में परिवार में
स्वच्छता एवं व्यक्तिगत मानसिक शुद्धता का विशेष रूप से ध्यान रखा जाता है। यह
परंपरा प्राचीन काल से जारी है।
. इससे
पहले कि हम श्राद्ध पक्ष के बारे में चर्चा करें आइये हम मनुष्य के जीवन एवं उसकी आत्मा पर संक्षिप्त
चर्चा करते हैं।
6. मानव जीव के अस्तित्व को वैज्ञानिकों एवम तर्क वादियों से स्वीकृति नहीं है।
7. तर्क
वादियों एवं वैज्ञानिकों के विचार से न तो जीवात्मा होती है और न ही
पुनर्जन्म है । कर्म फल के सिद्धांत से भी वे सहमत नहीं होते। कुछ विद्वान
तर्कवादी आत्मा के अस्तित्व को स्वीकारते अवश्य हैं
जो
व्यक्ति जीवात्मा और परमात्मा को नहीं मानते उन्हें हम नास्तिक कहते हैं। जाबाली ,
चार्वाक
जैसी नास्तिक विचार परंपराएं जैन दर्शन,
बौद्ध-दर्शन इनमे सर्वोपरि हैं.
आस्तिक
परंपराएं और मान्यताएं जीव के अस्तित्व को स्वीकृति देतीं है। हम सब भी मानते हैं कि शरीर के मर जाने के बावजूद भी जीव अस्तित्व में रहता है।
10. जिनने गीता पढ़ी है या उसके बारे में कुछ भी जानकारी
रखते हैं वे यह जरुर जानते हैं कि युगपुरुष कर्मयोगी श्री
कृष्ण ने आत्मा अर्थात जीव के बारे में क्या कहा था ?
11. आत्मा जो अजर है अमर है ,
शरीर
से मुक्त होते ही वह किसी न किसी रूप में
ब्रह्मांड में उपस्थित है। आत्मा पर किसी भी नकारात्मक या सकारात्य्मक किसी भी स्थिति
का प्रभाव नहीं होता।
हम
सब जानते हैं कि- आत्मा जब शरीर में होती
है तो शरीर को जीवंतता देती है । विश्व के अधिकांश मतवालंबी इस तथ्य को मानते हैं। अब्राहमिक
संप्रदायों में पुनर्जन्म का कॉन्सेप्ट तो नहीं है परंतु जीव द्वारा किये गए
कार्यों के अंतिम के गुण-दोष के आधार पर निर्णय ईश्वर द्वारा निर्णय लेने की अवधारणा
अवश्य है । प्राणी को स्वर्ग भेजना है या नरक यह अंतिम निर्णय के वक्त ईश्वर ही
करेंगें.
श्राद्ध्
आयोजन के लिए क्या निर्धारित है..?
नीति
शास्त्र कहता है कि - जो आपके प्रति कुछ भी सकारात्मक कार्य करें तो उनके प्रति
हमें कृतज्ञापित करनी चाहिए।
भारतीय
जीवन दर्शन एवं सामाजिक परंपराओं के अनुसार हममें हर प्राणी के प्रति कृतज्ञता की
अभिव्यक्ति करनी चाहिए। यह धार्मिक आज्ञा मात्र नहीं है। बल्कि यह एक सामाजिकता का
भी उदाहरण है।
आपसे
निवेदन है कि आप इस पॉडकास्ट में अंत तक बने रहिए हम आपको श्राद्ध पक्ष के रहस्य
से परिचित करते हुए तर्कवादियों विचारों का सतर्कता से तथ्यात्मक खंडन कर रहें हैं -
सनातन परंपराओं के अनुसार हम श्राद्ध पक्ष के संबंध विचार करते हैं तो हम
पाते हैं की-
·
पूर्वजों के स्मृति दिवस
मनाने के लिए एक अवधि निर्धारित है. यह अवधि 15 दिवस में पूर्ण होती है. हिन्दी
कैलेण्डर के अनुसार गणेशोत्सव के समापन के पश्चात प्रारम्भ प्रथम दिवस से अंतिम
दिवस तक अर्थात “पितृ-मोक्ष अमावश्या” तक की अवधि में जिस तिथि में पूर्वज का
देहावसान होता है उस दिन से “पितृ- मोक्ष अमावश्या” तक पिता या माता की स्मृति में जल अर्पण किया जाता है. जिसे
तर्पण कहते हैं , इस प्रक्रिया में अलग अलग स्थान के अनुसार अलग अलग तरीके अपनाए
जाते हैं.
·
स्मृति दिवस पर तर्पण करते
समय पिता या माता के अतिरिक्त देवताओं,
ऋषियों, भीष्म-पितामह,
के अलावा श्राद्ध कर्ता द्वारा अपने कुटुंब के , सभी पूर्वजों,
समकालीन भाइयों, बहनों , चाचाओं,
मित्रों, ज्ञात या अज्ञात लोगों,
तथा प्रत्येक व्यक्ति के लिए सम्मान दिया जाता है जो अब इस दुनियां में नहीं हैं.
पितृपक्ष का
उद्देश्य क्या है
·
दिवंगतों को मुख्य रूप से केवल
पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करना है।
·
"15 दिनों तक अपने
दिवंगत पूर्वजों का स्मरण करने की
प्राथमिक शर्त पुत्र तथा पुत्र वधू तथा बच्चों को बंधनकारी होता है कि श्राद्ध
पक्ष में घर को साफ सुथरा एवं आसपास के वातावरण मैं स्वच्छता बनाए रखना ।
·
आप सोचते होंगे कि श्राद्ध
पक्ष में क्या केवल उनका स्मरण किया जाना है जो आपके रिश्तेदार हैं ऐसा नहीं है।आप
जब तर्पण की संपूर्ण प्रक्रिया देखते हैं तब आपको पता चलता है कि - देवता,
ऋषि,
सहित
उन सभी के प्रति कृतज्ञता व्यक्ति की जाती है जो इस पृथ्वी पर मानव स्वरूप में
जन्म लेते हैं और मरते हैं। आपने सुना होगा जब कभी तर्पण किया जाता है तो अपने
निकटतम रक्त संबंधियों से लेकर रिश्तेदारों तक के नाम का उल्लेख किया जाता है।
इससे स्पष्ट होता है कि हम जिनका भी सम्मान करते हैं उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त
करते हैं और प्रतीक स्वरूप उनके लिए जल अर्पित करते हैं।
·
इसके अलावा गृहस्थ साधक
प्रत्येक प्राणी मात्र के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है। तर्पण करते वक्त पुरोहित
ऋषि मुनियों के साथ-साथ भीष्म पितामह सहित ज्ञात अज्ञात सभी जीवों उल्लेख करते हुए
उनका सम्मान व्यक्त करते हैं।
श्राद्ध का प्रभाव
·
श्राद्ध प्रक्रिया का पालन
करने से हमारे मस्तिष्क में कृतज्ञता की भावना
मजबूत होती है। हम कृतज्ञता उन पर व्यक्त करते हैं जिन पर श्रद्धा और स्नेह
होता है।
·
श्राद्ध जैसे वार्षिक
रिचुअल की पुनर्रावृत्ति से मनो वैज्ञानिक तौर पर हम पवित्रता एवं कृतज्ञता के भाव
को अपनी आदत में आत्मसात कर सकते हैं।
क्या श्राद्ध में बहुत से ब्राह्मण को खीर खिलाने की बाध्यता है.?
·
सनातन धर्म में धार्मिक
रिचुअल्स बाध्यता के साथ पालन करने का कोई आदेश नहीं है. भारत एक कृषि-प्रधान देश
है जहां गोवंश से दूध,
खेतों से चावल आदि विपुल मात्रा में उपलब्ध होता है. जहां चावल की उपज नहीं होती
वहां स्थानीय अनाज से बने खाद्य पदार्थ खिलाने का प्रचलन है.
·
श्राद्ध का संबंध पूर्वजों
के प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति पर आधारित है. न कि किसी ब्राह्मण या ब्राह्मणों
को भोजन कराने मात्र से ,
·
श्राद्ध में केवल चार पत्तल/थालियां परोसी जाती हैं. एक पुरोहित के
लिए, दूसरी गाय के लिए,
तीसरी चींटी/कीट पतंगों के लिए,
चौथी कौए के लिए.
·
पुरोहित आपको मार्गदर्शन
देकर प्रक्रिया पूर्ण कराता है,
गाय प्राचीन ग्रामीण भारत से अब तक जीवन
का आधार है, चींटी /पतंगे तथा
कौआ आदि इको-सिस्टम का हिस्सा हैं,
·
क्या श्राद्ध में
बड़ी संख्या में भोजन कराना चाहिए
·
श्राद्ध करना ही बाध्यता
नहीं है तो यह प्रश्न बेमानी है. प्रश्न केवल इतना है कि यदि आप अपने दिवंगत पूर्वजों/ सहयोगियों , तथा सम्पूर्ण मानवता के
प्रति सम्मान एवं करुणा भाव रखते हैं तो
उनको याद करना चाहेंगे.
·
क्या श्राद्ध कुरीति
है...
·
सत्यार्थ-प्रकाश के 11वें
सम्मुल्लास में स्वामी दयानंद जी लिखा है कि –“पुरखों को दिया गया पानी तर्पण
भोजनादि उन तक नहीं पहुंचता. !” भौतिक रूप से इस तथ्य को नहीं नकारना चाहिए . इससे
मैं सहमत हूँ.
·
आचार्य रजनीश जैसे तर्क
वादी "श्राद्ध पक्ष को पुरोहितों द्वारा बनाई गई रूढ़िवादी परंपरा मानते हैं”
तर्कशास्त्रियों की दृष्टि उतना ही देखती है
जितना वह देख पाती है। उन्हौने इसके पीछे के मनोविज्ञान को शायद ही समझा हो.
वास्तव में श्राद्ध रूढ़िवाद नहीं है बल्कि एक सोशल इवेंट
है। जो एक व्यक्तिगत-अभ्यास एवं सामूहिक होने पर सोशल इवेंट है.
जिसमें में हम अपने जहां एक ओर लौकिक जीवन के कर्तव्यों
का निर्वहन करते नजर आते हैं, वहीँ दूसरी ओर श्रद्धा , कृतज्ञता एवं आभारी होने की
भावना से स्वयम को भरा महसूस करते हैं. ।
श्राद्ध पक्ष में पंडितों को भोजन करना उद्देश्य मात्र
नहीं है, आर्थिक रूप से गरीब
लोग के लिए कर्ज लेकर श्राद्ध करने की बाध्यता नहीं है।
सामाजिक विज्ञान सामूहिक भावात्मक विकास के लिए प्रेरित
करता है।
सामाजिक विज्ञान
नीति विज्ञान और मनोविज्ञान हमेशा जन्म से
लेकर मृत्यु तक की गतिविधियों का अध्ययन करता है तथा मार्गदर्शन प्रदान करता है।
हमारा सामाजिक जीवन
मानव प्रजाति की राष्ट्र,
समाज, कुटुंब,
परिवार
एवं वैयक्तिक उत्कर्ष में सहायक होता है.
पूर्वजों ने हमें
यही सिखाया। इसके परिणाम भी सुखद है।
हम ऐसे ही बदलाव
लाने के लिए अपने पूर्वजों को धन्यवाद कहते हैं। धन्यवाद कहने की इस प्रक्रिया को
श्राद्ध पक्ष में भली भांति दोहराते हैं .
इस प्रकार हम धन्यवाद
का प्रकटीकरण करके कल्चरल निरंतरता को गतिमान बनाए रखते हैं ।
पृथ्वी के प्रत्येक मानव समूह की नई पीढ़ी
ने अपने अपने तरीके से पूर्वजों के प्रति
कृतज्ञता करना प्रारंभ कर दिया।
अपने पूर्वजों के
प्रति श्रद्धा व्यक्त करना कैसे कोई पाखंड हो सकता है । अब आप ही बताइए यह
अवैज्ञानिक कैसे हैं?
तर्क वादियों के
पुरोधा प्रोफेसर चंद्र मोहन जैन ने पितृपक्ष और श्राद्ध पूरी ताकत से खंडन किया। खंडन करना उनकी अपनी जगह वैचारिक प्रक्रिया है लेकिन उन्होंने
इसका उपहास भी किया है बिना यह अनुमान लगाए कि श्राद्ध जैसे रिचुअल के पीछे का सामाजिक,
मनोवैज्ञानिक,
आधार
क्या है ?
विगत कई दिनों से उनके अनुसरण करने वाले उनका जन्म दिवस उनके
स्मृति दिवस पर महोत्सवों की कवायद भी कर रहे हैं।
जैसे मूर्ति पूजा का विरोध करने वाले किसी व्यक्ति की मूर्तियां
बना बना कर उनका पूजन किया जाए तब कैसा लगेगा।
पैगंबर मोहम्मद ने
मूर्ति पूजा को मान्यता नहीं दी उनकी कोई मूर्ति इस्लाम मानने वाले कभी नहीं रखते
न ही वे उसकी कल्पना करते।
प्रोफेसर
रजनीश को यह भ्रम था कि उनकी शिक्षा के
बाद श्राद्ध बंद हो जाएंगे। ऐसा कुछ हुआ
नहीं, इसके विपरीत आप
उनका ही श्राद्ध मनाया जाने लगा।
फर्क जरा सा इतना
है कि -"अब सरकारी सहायता मांग कर, एवं
स्वयं का धन एकत्र कर जनता द्वारा उनकी याद में श्राद्ध मनाने का प्रयास होने
लगा!"
कम्युनों में ओशो का जन्मदिन, स्मृति दिवस मनाया जाता है। यूं तो दुनिया भर
में लोगों के स्मृति दिवस मनाए जाते हैं ,
इसमें बुराई क्या है । पंडितों को खीर
खिलाने के खिलाफ बोलने वाले अकूत संपदा के स्वामी 99 रोल्स-रोयस के मालिक आचार्य रजनीश के डिवोटी मुझे
तरंग आडिटोरियम के आसपास आयोजित गतिविधियों में तरंगित अवास्त्य्हा के पीछे अद्भुत अवस्था में मिले थे , कदाचित
सनातनी श्राद्ध में ऐसा नहीं होता .
जब कोई श्राद्ध पक्ष सवाल उठाता है तो मुझे लगता है कि वह महापुरुषों के
स्मृति दिवसों पर भी सवाल उठाता ही होगा.
हिंदुत्व पर सवाल
उठाने वालों से एक सवाल इस तरह पूछना चाहता हूँ....
वक्त
ज़ाया न कर, मुझ को आजमाने में
।
बहुत
से लोग हैं , मेरी
तरह ज़माने में ।।
भेज
न मुझको,सवालों पे सवालों की रसद
भेज
हों उतने ही जितने, तेरे बारदाने में ।।

ad
कुल पेज दृश्य
-
अध्याय 01 में आपने पढ़ा कि किस प्रकार से वामपंथी और भारतीय सहित्यकारों ने इतिहासकारों के साथ मिलकर इस मंतव्य को स्थापित कर दिया कि...
-
आमतौर पर अपने आप को इंटेलेक्चुअल साबित करने वाले लोग आत्मा के अस्तित्व को अस्वीकार करते हैं ! जो लोग परंपरागत विचारों को मानते हैं वह आत्म...