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गुरुवार, 17 जुलाई 2025

उषा देवी मित्रा - स्वानुशासित नारीवादी लेखिका

उषा देवी मित्रा, हिंदी और बांग्ला साहित्य की प्रख्यात लेखिका, जिन्होंने नारी मुक्ति, सामाजिक सुधार, और भारतीय संस्कृति को अपनी रचनाओं में संवेदनशीलता से चित्रित किया। उनकी कहानियाँ और उपन्यास जैसे ‘प्यासी हूँ’ और ‘सम्मोहिता’ नारी जीवन की जटिलताओं को दर्शाते हैं।
उषा देवी मित्रा का जीवन परिचय
1897 में जबलपुर में जन्मी उषा देवी मित्रा हिंदी और बांग्ला साहित्य की एक ऐसी लेखिका थीं, जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से नारी जीवन की पीड़ा, संघर्ष, और आकांक्षाओं को यथार्थवादी ढंग से प्रस्तुत किया। उनकी लेखनी यूरोपीय नारी मुक्ति आंदोलन की फूहड़ता से अप्रभावित रही, और उन्होंने भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को सम्मान देते हुए नारी सशक्तीकरण का स्वर बुलंद किया।
उनकी प्रमुख रचनाएँ जैसे ‘प्यासी हूँ..!’, ‘सम्मोहिता’, और ‘सांध्य पूर्वी’ में नारी जीवन की जटिलताओं को संवेदनशीलता के साथ चित्रित करती हैं। उनकी कहानियों और उपन्यासों ने द्विवेदी युग की साहित्यिक धारा को समृद्ध किया और सामाजिक सुधार के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाया गया है।
साहित्यिक और सामाजिक योगदान
उषा देवी मित्रा ने न केवल साहित्य के क्षेत्र में योगदान दिया, बल्कि सामाजिक सुधार के लिए भी महत्वपूर्ण कार्य किए। उन्होंने नारी मंडल समिति की स्थापना की, जिसके माध्यम से महिलाओं के उत्थान और सशक्तीकरण के लिए प्रयास किए। उनकी रचनाएँ सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार करती हैं और नारी मुक्ति के स्वदेशी स्वर को उजागर करती हैं।
उनकी प्रमुख कृतियों में शामिल हैं:
उपन्यास: वचन का मोल, प्रिया, नष्ट नीड़, जीवन की मुस्कान, सोहनी, सम्मोहिता।
कहानी संग्रह: आँधी के छंद, महावर, नीम चमेली, मेघ मल्लार, रागिनी, सांध्य पूर्वी, रात की रानी।
प्रकाशन: उनकी रचनाएँ प्रवासी, भारतवर्ष, वसुमती, और पंचपुष्प जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं।
उनकी कहानी ‘सांध्य पूर्वी’ को सेकसरिया पुरस्कार से सम्मानित किया गया, और मध्य प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन के जबलपुर अधिवेशन में तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारिकाप्रसाद मिश्र ने उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए अभिनंदन किया।

   पारिवारिक और शैक्षिक पृष्ठभूमि
उषा देवी मित्रा का जन्म 1897 में एक बौद्धिक और साहित्यिक परिवार में हुआ। उनके पिता हरिश्चंद्र दत्त एक प्रख्यात वकील और हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू के विद्वान थे, जो शिकार साहित्य के रचनाकार भी थे।
 उनके मामा सत्येंद्र नाथ दत्त बांग्ला के प्रसिद्ध लेखक थे, और उनके दादा रवींद्रनाथ ठाकुर विश्वविख्यात साहित्यकार थे। इस साहित्यिक माहौल ने उनकी रचनात्मकता को गहराई प्रदान की।
उषा जी की प्रारंभिक शिक्षा जबलपुर में हुई। 12-14 वर्ष की आयु में उनका विवाह क्षितिश्चंद्र मित्र से हुआ, जो एक विद्युत अभियंता थे। पति, पुत्र, बहन, और भाई के असामयिक निधन जैसी व्यक्तिगत त्रासदियों ने उनकी लेखनी को संवेदनशीलता और गहराई दी। पति के निधन के बाद वे शांतिनिकेतन गईं, जहाँ उन्होंने संस्कृत में विशेषज्ञता प्राप्त की और रवींद्रनाथ ठाकुर के मार्गदर्शन में अपनी साहित्यिक दृष्टि को समृद्ध किया।
उषा देवी मित्र का निधन 19 सितंबर 1967 को हुआ। 
नारीवादी लेखन में मौलिकता
उषा देवी मित्रा का लेखन यूरोपीय नारी मुक्ति आंदोलन से प्रभावित होने के बजाय भारतीय सांस्कृतिक निरंतरता और सामाजिक यथार्थवाद पर आधारित था। उनकी कहानी ‘प्यासी हूँ..!’ नारी की आंतरिक पीड़ा और आकांक्षाओं को दर्शाती है, जबकि ‘सम्मोहिता’ और ‘दीक्षिता’ जैसी रचनाएँ रवींद्रनाथ ठाकुर और सत्येंद्र नाथ दत्त द्वारा सराही गईं। उनकी रचनाएँ नारी जीवन की शारीरिक और मानसिक पीड़ा को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करती हैं।
पुरस्कार और सम्मान
उषा देवी मित्रा की साहित्यिक उपलब्धियों को कई सम्मानों से नवाजा गया:
सेकसरिया पुरस्कार: उनकी कहानी ‘सांध्य पूर्वी’ के लिए।
मध्य प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन: जबलपुर अधिवेशन में अभिनंदन।
जबलपुर उन्हें याद रखना है  
उनकी स्मृतियों को सतत अविस्मरणीय बनाने श्रीमती साधना उपाध्याय संस्थापक त्रिवेणी परिषद जबलपुर द्वारा प्रतिवर्ष अहिंदी भाषी साहित्यकारों कलाकारों संस्कृति कर्मियों को सम्मानित करती हैं।
  यह सम्मान अब तक डॉ रोमा चटर्जी चंद्रशेखर सैन गुप्ता पद्मा बनर्जी गीता गीत डॉ इला घोष, मानिक तामस्कर आशा जड़े शरद महाजन सुधा पंडित अविनाश कस्तूरे रत्ना मुंजे पंजाबी काजल मानेक गुजराती , सरदार रतन सिंह गुरुनाम सिंह रील , कमलेश सूद हरवंश सिंह चकरेल , छाया मोदीराज डी वी राव नरेंद्र भूपेंद्र कुमार दवे अमृत लाल वेगड़ रजनी कांत यादव चंद्रभान अनाड़ी ज्योति मंगलनी ।
  हास्य कलाकार के के नायकर कुलकर्णी बंधु स्व हेमंत जी एवं श्री दत्तात्रेय को मराठी रजनी कांत त्रिवेदी गुजराती आदि को सम्मानित किया गया है। 
उषा देवी मित्रा हिंदी और बांग्ला साहित्य की एक ऐसी साहित्यकार थीं, जिन्होंने अपनी लेखनी और सामाजिक कार्यों से समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास किया। उनकी रचनाएँ नारी जीवन की जटिलताओं और सामाजिक मुद्दों को उजागर करती हैं। 

मंगलवार, 10 जून 2025

2022 में हर 32 घंटे में एक पति की हत्या उसकी पत्नी द्वारा हुई ?


1 भारत में यौनिक स्वेच्छाचारिता और दांपत्य हत्याएँ: 2024-2025 के प्रमुख मामले और सामाजिक प्रभाव
2 भारत में यौनिक स्वेच्छाचारिता से जुड़ी पति हत्याओं का ट्रेंड क्या है? 2024 और 2025 के प्रमुख मामलों, जैसे सोनम रघुवंशी और अंजलि कुशवाहा, के साथ जानें सामाजिक और पारिवारिक कारक।)
  भाग 1: दांपत्य जीवन में यौनिक स्वेच्छाचारिता और अपराध का उदयआज के हमारे पॉडकास्ट में आपका स्वागत है। हम चर्चा करेंगे कि भारत में दांपत्य जीवन में यौनिक स्वेच्छाचारिता के कारण महिलाओं द्वारा किए गए अपराध, विशेष रूप से पति हत्याएँ, किस तरह सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं।हाल ही में मेघालय में सोनम रघुवंशी और राजा रघुवंशी की हत्या की घटना ने देशभर में सनसनी मचा दी। यह मामला न केवल प्रेम प्रसंग से जुड़ा है, बल्कि खराब पेरेंटिंग और सामाजिक मूल्यों में कमी को भी उजागर करता है।
पेरेंटिंग की भूमिका:
अच्छी पेरेंटिंग बच्चों को सही और गलत का भेद सिखाती है। सोनम के मामले में, यह स्पष्ट है कि उनकी परवरिश में कहीं न कहीं कमी रही, जिसने उन्हें गलत रास्ते पर ले गया। माता-पिता को अपने बच्चों के साथ खुला संवाद करना चाहिए और उन्हें नैतिक मूल्यों से जोड़ना चाहिए।
भाग 2: डिजिटल युग और वर्चुअल फंतासी का प्रभावमोबाइल और सोशल मीडिया आज हमारी सबसे बड़ी कमजोरी बन चुके हैं। बच्चे और युवा डिजिटल दुनिया की चकाचौंध में खो रहे हैं। वर्चुअल फंतासी और रोमांच की तलाश अक्सर प्रेम और उन्माद की ओर ले जाती है, जो अपराध का कारण बन सकती है।उदाहरण: सोशल मीडिया पर प्रेम प्रसंग शुरू होने से कई युवा और प्रौढ़ अनैतिक रिश्तों में फंस रहे हैं, जो हिंसक परिणामों की ओर ले जाता है।
भाग 3: प्रेम और यौनिक उन्माद: अपराध का रास्ताप्रेम एक स्वाभाविक भावना है, लेकिन जब यह दैहिक लालसा और उन्माद में बदल जाता है, तो यह अपराधों को जन्म देता है। भारत में किशोरों और युवाओं में यौनिकता के विकृत स्वरूप को रोकने में अभिभावक अक्सर असफल हो रहे हैं।सामाजिक चुनौती:किशोरों और युवाओं में गलत यौनिक व्यवहार बढ़ रहा है।प्रौढ़ महिलाएँ भी प्रेम प्रसंगों के कारण हिंसक कदम उठा रही हैं।
भाग 4: दांपत्य जीवन की चुनौतियाँ और पति हत्याएँदांपत्य जीवन अब एक जटिल चुनौती बन चुका है। 2024 और 2025 में कई ऐसी घटनाएँ सामने आईं, जिनमें महिलाओं ने अपने प्रेमियों के साथ मिलकर अपने पतियों की हत्या की।
गैर-आधिकारिक दावा: सामाजिक कार्यकर्ता दीपिका नारायण भारद्वाज के अनुसार, 2022 में हर 32 घंटे में एक पति की हत्या उसकी पत्नी द्वारा हुई। यह दावा सत्यापित नहीं है, लेकिन 2024 और 2025 में भी ऐसे मामले प्रासंगिक रहे।
भाग 5: 2024 और 2025 के प्रमुख मामले 
   2024 और 2025 में यौनिकता के उन्माद के कारण पति हत्याओं के कुछ प्रमुख मामले दिए गए हैं:
  1. सोनम रघुवंशी (मेघालय, मई 2024): सोनम ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति राजा रघुवंशी की हनीमून के दौरान हत्या की। हत्या के लिए सुपारी देने की संभावना जताई गई।
2.अंजलि कुशवाहा (ग्वालियर, सितंबर 2024): अंजलि ने प्रेमी गौरव और मौसेरे भाई के साथ मिलकर पति लोकेंद्र की हत्या की और इसे प्राकृतिक मौत दिखाने की कोशिश की।
3.मुस्कान रस्तोगी (मेरठ, मार्च 2025): मुस्कान और प्रेमी साहिल शुक्ला ने पति सौरभ राजपूत की हत्या की, शव को सीमेंट ड्रम में छिपाया।
4.पारुल (बिजनौर, मार्च 2025): पारुल ने प्रेमियों के साथ मिलकर पति मकेंद्र की हत्या की, क्योंकि मकेंद्र ने उनकी अश्लील वीडियो देखी थी।
5.गोपाली (जयपुर, अप्रैल 2025): गोपाली ने प्रेमी के साथ पति की हत्या की और शव को जलाने की कोशिश की।
6.प्रगति (औरैया, 2025): प्रगति ने शादी के 15 दिन बाद प्रेमी अनुराग के साथ मिलकर पति दिलीप की हत्या के लिए सुपारी दी।
7.प्रियंका (गाजियाबाद, मई 2025): प्रियंका ने प्रेमी रिंकू के साथ पति संजय की हत्या की।
8.नाबालिग किशोरी (जबलपुर, 2023): एक नाबालिग ने प्रेमी के साथ मिलकर अपने पिता की हत्या की।
सामाजिक प्रभाव: ये घटनाएँ सामाजिक व्यवस्था पर नकारात्मक असर डाल रही हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) में इनके लिए अलग डेटा नहीं है, लेकिन ये मामले समाज में नैतिक और पारिवारिक मूल्यों पर सवाल उठाते हैं।
भाग 6: 
निष्कर्ष और समाधान
    भारत में यौनिक स्वेच्छाचारिता और दांपत्य हत्याएँ एक गंभीर सामाजिक मुद्दा बन चुके हैं। समाज एक विकृत दौर से गुजर रहा है, और इसके लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं:
1.बेहतर पेरेंटिंग: 
माता-पिता को बच्चों को नैतिक शिक्षा और संवाद का महत्व सिखाना चाहिए।डिजिटल जागरूकता: सोशल मीडिया और मोबाइल के दुरुपयोग को रोकने के लिए जागरूकता बढ़ानी होगी।
2.कानूनी और सामाजिक सुधार: वैवाहिक विवादों को सुलझाने के लिए परामर्श और कानूनी सहायता को बढ़ावा देना चाहिए।मित्रों, यह जानकारी दुखद है, लेकिन हमें वास्तविकता को स्वीकार कर इसके समाधान की दिशा में काम करना होगा।
3. महिलाओं द्वारा किए गए अपराधों का पृथक से आंकलन एवं विश्लेषण करना। पोर्न साइट को पूर्ण रूप से प्रतिबंधित करना।
4. बेमेल विवाहों को रोकना 
5. लिवइन रिश्तों को आपराधिक माना जाना तथा उसे अधिकारों से वंचित करना।

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